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BREAKING: भारत ने नौसेना के लिए अस्सी हजार करोड़ रुपये के अगली पीढ़ी के स्टील्थ डिस्ट्रॉयर को दी मंजूरी

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय नौसेना के लिए 80,000 करोड़ रुपये के अगली पीढ़ी के स्टील्थ डिस्ट्रॉयर को मंजूरी दी है।

BREAKING: भारत ने नौसेना के लिए अस्सी हजार करोड़ रुपये के अगली पीढ़ी के स्टील्थ डिस्ट्रॉयर को दी मंजूरी
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

सारांश

  • रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय नौसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए प्रोजेक्ट 18A के तहत भविष्य के युद्धपोतों के निर्माण को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने हाल ही में प्रोजेक्ट 18A के तहत इन भविष्य के युद्धपोतों के लिए अपनी सहमति प्रदान की है।
  • यह कार्यक्रम ऐसे समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति का लगातार विस्तार कर रहा है।
  • भारतीय नौसेना वर्तमान में लगभग 12 या 13 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर का संचालन करती है, जो इसके सतह लड़ाकू बेड़े की रीढ़ हैं।

रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय नौसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए प्रोजेक्ट 18A के तहत भविष्य के युद्धपोतों के निर्माण को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। यह परियोजना लगभग 80,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ शुरू की जाएगी, जिसका उद्देश्य अगली पीढ़ी के स्टील्थ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर विकसित करना है। इन युद्धपोतों को उन्नत सेंसर, हथियारों और आधुनिक तकनीकों से लैस किया जाएगा ताकि समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके। अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के पांच से दस साल बाद इन युद्धपोतों की डिलीवरी शुरू होने की उम्मीद है।

प्रोजेक्ट 18A की मुख्य बातें
प्रतीकात्मक तस्वीर (AI निर्मित) | ग्राफिक: डेमोक्रेटिक भारत लाइव

उन्नत नौसैनिक क्षमताओं के लिए रणनीतिक मंजूरी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने हाल ही में प्रोजेक्ट 18A के तहत इन भविष्य के युद्धपोतों के लिए अपनी सहमति प्रदान की है। रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस महत्वपूर्ण विकास की पुष्टि की है, जो भारतीय नौसेना के बेड़े को आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस कार्यक्रम की जटिलता और बड़े पैमाने को देखते हुए, यह अनुमान लगाया गया है कि अनुबंध प्रक्रिया पूरी होने के बाद पहले युद्धपोत की प्राप्ति में पांच से दस वर्ष का समय लग सकता है। यह लंबी अवधि इन जहाजों में शामिल की जाने वाली अत्याधुनिक तकनीकों और उनके निर्माण की विस्तृत प्रक्रिया को दर्शाती है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भारत की समुद्री रक्षा को और अधिक मजबूत बनाना है।

तकनीकी विशेषताएं और स्वदेशी विकास पर जोर

प्रस्तावित कार्यक्रम के तहत विकसित होने वाले युद्धपोतों में लगभग 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री होने की उम्मीद है। यह भारत के आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र की कंपनियों, दोनों को भाग लेने का अवसर मिलेगा। इन अगली पीढ़ी के डिस्ट्रॉयर को नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन किया जाएगा। ये जहाज विशाखापत्तनम श्रेणी के डिस्ट्रॉयर की तुलना में काफी अधिक उन्नत प्रणालियों से लैस होंगे। इनमें बेहतर मारक क्षमता, परिष्कृत निगरानी सेंसर, बेहतर वायु रक्षा प्रणालियां और उन्नत पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताएं शामिल होंगी, जो नौसेना को उभरते खतरों के खिलाफ अधिक परिचालन लचीलापन प्रदान करेंगी।

क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का समाधान

यह कार्यक्रम ऐसे समय में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है जब चीन हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति का लगातार विस्तार कर रहा है। चीन अपनी पनडुब्बी बेड़े को भी मजबूत कर रहा है, जो भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है। इसके साथ ही, पाकिस्तान भी उन्नत पनडुब्बियों को शामिल करके अपनी पानी के नीचे की युद्ध क्षमताओं को बढ़ा रहा है। बदलती सुरक्षा स्थितियों ने भारत के लिए अपने सतह लड़ाकू बेड़े को मजबूत करने और हिंद महासागर क्षेत्र में एक विश्वसनीय समुद्री निवारक बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। ये नए युद्धपोत भारत के समुद्री हितों की रक्षा करने और क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

मौजूदा सतह युद्ध बेड़े का आधुनिकीकरण

भारतीय नौसेना वर्तमान में लगभग 12 या 13 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर का संचालन करती है, जो इसके सतह लड़ाकू बेड़े की रीढ़ हैं। इन जहाजों में दिल्ली श्रेणी, कोलकाता श्रेणी और विशाखापत्तनम श्रेणी के डिस्ट्रॉयर शामिल हैं। ये युद्धपोत वर्तमान में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, नौसैनिक तोप और पनडुब्बी रोधी उपकरणों जैसे उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस हैं। हालांकि, नौसेना के कई मौजूदा डिस्ट्रॉयर आने वाले वर्षों में सेवामुक्त होने वाले हैं। इसलिए, बेड़े की परिचालन शक्ति को बनाए रखने के लिए उन्नत फ्रंटलाइन सतह लड़ाकू जहाजों को शामिल करना अनिवार्य हो गया है। प्रोजेक्ट 18A इसी कमी को पूरा करने की एक रणनीतिक योजना है।

भविष्य का परिचालन प्रभाव और तकनीकी एकीकरण

अगली पीढ़ी के ये डिस्ट्रॉयर भारत की मारक क्षमता, निगरानी और बहु आयामी युद्ध क्षमताओं में काफी वृद्धि करेंगे। इनके उन्नत सेंसर और पनडुब्बी रोधी युद्ध प्रणालियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगी क्योंकि नौसेना तेजी से परिष्कृत होते पानी के नीचे के खतरों का मुकाबला करने के लिए तैयार हो रही है। इन जहाजों का डिजाइन और उनमें शामिल तकनीकें उन्हें भविष्य के युद्धक्षेत्र के अनुकूल बनाएंगी। यह परियोजना न केवल नौसेना की युद्धक क्षमता को बढ़ाएगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी बढ़ावा देगी। निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों की भागीदारी से भारत में युद्धपोत निर्माण के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी, जिससे भविष्य की रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशी समाधान तैयार करने में मदद मिलेगी।

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स्रोत: The Hindu

लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

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