Direct-To-Phone Satellite: एलन मस्क की स्टारलिंक ने भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की दिशा में नया कदम उठाया है। कंपनी ने दूसरी जेनरेशन सैटेलाइट नेटवर्क और डायरेक्ट-टू-डिवाइस यानी डी2डी सेवा के लिए ताजा आवेदन दाखिल किया है। इस सेवा के जरिए सामान्य या कम्पैटिबल फोन मोबाइल टावर की रेंज से बाहर होने पर भी सैटेलाइट से जुड़ सकेंगे।
खबर इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट पर आधारित है जिसे रॉयटर्स ने 20 अगस्त को प्रकाशित किया। अभी यह रिपोर्टेड डेवलपमेंट है और आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है। स्टारलिंक पहले ब्रॉडबैंड डिश सेवा पर फोकस कर रही थी। अब वह मोबाइल कवरेज लेयर में जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
Direct-To-Phone Satellite: नया आवेदन क्यों जरूरी पड़ा
भारत के स्पेस रेगुलेटर इन-स्पेस ने स्टारलिंक की पहली जेनरेशन फिक्स्ड सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सिस्टम को मंजूरी दी थी। इससे पहले जीन2 आवेदन में फ्रीक्वेंसी और कंप्लायंस से जुड़े सवाल उठे थे। डी2डी वाला हिस्सा बाद में विकसित हुआ इसलिए नया आवेदन दाखिल किया गया। कंपनी मोबाइल सैटेलाइट सेवा और डायरेक्ट-टू-डिवाइस रूट दोनों पर काम करना चाहती है।
डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा क्या है
डी2डी सेवा में फोन सीधे सैटेलाइट से कनेक्ट हो सकता है। जब मोबाइल टावर की रेंज खत्म हो जाए तो टेक्स्ट, कॉल या लाइट डेटा सैटेलाइट के जरिए चल सकता है। यह आपातकालीन संदेश, ग्रामीण इलाकों और आपदा के समय खास तौर पर उपयोगी साबित हो सकता है। अभी शुरुआती सेवाएं हल्के ट्रैफिक यानी मैसेजिंग पर केंद्रित रहने की संभावना है।
भारत में स्टारलिंक की मौजूदा स्थिति
स्टारलिंक को जून 2025 में यूनिफाइड लाइसेंस मिला था। इसमें जीएमपीसीएस, वीएसएटी और आईएसपी-ए शामिल हैं। अनंतिम टेस्ट स्पेक्ट्रम भी मिला हुआ है। पहली जेनरेशन स्पेस अप्रूवल मिल चुका है। व्यावसायिक सेवा शुरू करने के लिए अभी स्पेक्ट्रम असाइनमेंट, सिक्योरिटी क्लियरेंस और ग्राउंड गेटवे पूरे होने बाकी हैं।
Direct-To-Phone Satellite: जियो और एयरटेल के साथ समझौते
स्टारलिंक ने मार्च 2025 में जियो और एयरटेल दोनों के साथ डिस्ट्रीब्यूशन समझौते किए थे। इनमें उपकरण बिक्री, एक्टिवेशन, इंस्टॉलेशन और संभवतः ऑपरेटर इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल की बात है। इससे स्टारलिंक को भारतीय बाजार में तेजी से पहुंचने में मदद मिल सकती है। ग्राहक परिचित ब्रांड के जरिए सेवा ले सकेंगे।
प्रतिस्पर्धा का मैदान
भारत में सैटेलाइट सेवाओं के लिए कई खिलाड़ी सक्रिय हैं। जियो एसईएस के साथ वेंचर चला रहा है और खुद का एलईओ कॉन्स्टेलेशन भी इवैल्यूएट कर रहा है। वनवेब भारती से जुड़ा है और एंटरप्राइज फोकस रखता है। अमेजन ग्लोबलस्टार खरीदकर डी2डी प्लान बना रहा है। वोडाफोन आइडिया एएसटी स्पेसमोबाइल के साथ साधारण फोन कनेक्टिविटी पर काम कर रहा है। नियम तय होने के दौरान सभी अपनी जगह मजबूत करना चाहते हैं।
Direct-To-Phone Satellite: सिक्योरिटी और रेगुलेटरी चुनौतियां
भारतीय नियम सैटेलाइट नेटवर्क को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मानते हैं। भारतीय यूजर्स का ट्रैफिक देश के अंदर रहना चाहिए। लोकल गेटवे, लॉफुल इंटरसेप्शन और मॉनिटरिंग एक्सेस जरूरी है। स्टारलिंक के इंटर-सैटेलाइट लेजर लिंक इस प्रक्रिया को और जटिल बनाते हैं। सुरक्षा एजेंसियां लाइव डेमोंस्ट्रेशन के बाद ही अंतिम मंजूरी देंगी।
व्यावसायिक लॉन्च से पहले क्या बाकी
इन-स्पेस को जीन2 और डी2डी डिजाइन पर फैसला करना है। टीआरएआई एससीएन ऑथराइजेशन पर सिफारिशें जारी करेगी। इसके बाद डॉट स्पेक्ट्रम चार्ज और शर्तें तय करेगा। ग्राउंड स्टेशन तैयार होने और विदेशी निवेश मंजूरी पूरा होने के बाद ही सेवा शुरू हो सकती है। डिश ब्रॉडबैंड पहले आ सकती है जबकि व्यापक डी2डी बाद में।
Direct-To-Phone Satellite: बाजार की संभावनाएं
भारत में 1.08 अरब ब्रॉडबैंड सब्सक्रिप्शन हैं। जियो और एयरटेल मिलकर 90 करोड़ से ज्यादा यूजर्स को सेवा देते हैं। सैटेलाइट सेवा उन इलाकों में काम आएगी जहां फाइबर पहुंचाना महंगा है। टावर बैकहॉल, द्वीप, पहाड़ी क्षेत्र, आपदा राहत और प्रीमियम रिमोट होम इसके शुरुआती ग्राहक हो सकते हैं। घने शहरों में फाइबर और 5जी ही मुख्य रहेंगे।
एलन मस्क की स्टारलिंक ने भारत में दूसरी जेनरेशन सैटेलाइट नेटवर्क और डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा के लिए नया आवेदन किया है। इससे फोन सीधे सैटेलाइट से जुड़ सकेंगे। कंपनी के पास लाइसेंस और टेस्ट स्पेक्ट्रम है लेकिन व्यावसायिक लॉन्च के लिए स्पेक्ट्रम, सुरक्षा मंजूरी और गेटवे बाकी हैं। जियो व एयरटेल के साथ समझौते मौजूद हैं। प्रतिस्पर्धा तेज है और नियम अभी आकार ले रहे हैं। सैटेलाइट सेवा दूरदराज़ क्षेत्रों और आपातकालीन कवरेज के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। अंतिम मंजूरी के बाद ही तस्वीर साफ होगी।
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