Raksha Bandhan History: भाई और बहन के पवित्र रिश्ते का जश्न मनाने वाला महापर्व रक्षाबंधन हर साल सावन मास की पूर्णिमा तिथि को बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस बार देश भर में यह पावन पर्व अट्ठाईस अगस्त को मनाया जाएगा, जहां बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करेंगी। वहीं भाई भी हर परिस्थिति में अपनी बहन के मान-सम्मान की रक्षा करने का संकल्प लेंगे। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि इस परंपरा की शुरुआत आखिर कहां से हुई थी और सबसे पहले किसने किसे राखी बांधी थी? अगर आप इतिहास और पुराणों के पन्नों को पलटेंगे, तो आपको ऐसे कई दिलचस्प और हैरान करने वाले प्रसंग मिलेंगे जो इस त्योहार के गहरे महत्व को बयां करते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रक्षाबंधन की सबसे पहली और सबसे ज्यादा मानी जाने वाली कथा श्रीमद्भागवत पुराण से जुड़ी है, जो माता लक्ष्मी और असुरराज बलि के बीच के प्रसंग को दर्शाती है। असुरराज बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने पाताल लोक का द्वारपाल बनना स्वीकार कर लिया था, जिससे माता लक्ष्मी काफी चिंतित हो गई थीं। तब माता लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंचकर राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बना लिया। जब बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा, तो माता ने अपने असली रूप में आकर भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटने का वचन मांग लिया, जिसे बलि ने रक्षा बंधन के रिश्ते का मान रखते हुए खुशी-खुशी पूरा किया था।
Raksha Bandhan History: युद्धभूमि और इतिहास के पन्नों में राखी का अदभुत सम्मान
राखी का यह पवित्र धागा केवल भाई-बहन के रिश्ते तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब इसने बड़े-बड़े युद्धों और राजनीतिक फैसलों की दिशा बदल दी। ग्रीक विजेता सिकंदर और भारत के प्रतापी राजा पुरु यानी पोरस के बीच जब भीषण युद्ध छिड़ा था, तब सिकंदर की पत्नी अपने पति की सुरक्षा को लेकर काफी परेशान थीं। उन्होंने राजा पुरु को एक रक्षासूत्र भेजा और उन्हें अपना भाई मानते हुए युद्ध में सिकंदर को जीवनदान देने का वचन मांगा। राजा पुरु ने भारतीय संस्कृति के महान आदर्शों का पालन करते हुए युद्धभूमि में उस राखी के मान को रखा और सिकंदर को जीवनदान दिया था।
मध्यकालीन भारत के इतिहास में चित्तौड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कहानी भी इसी परंपरा का एक बहुत बड़ा उदाहरण मानी जाती है। जब संकट के समय रानी कर्णावती के पास अपने राज्य को बचाने का कोई रास्ता नहीं बचा था, तब उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर मदद की गुहार लगाई थी। हुमायूं ने उस राखी के संदेश को सहर्ष स्वीकार किया और बिना किसी देरी के अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की ओर निकल पड़े। इस घटना ने यह साबित कर दिया था कि राखी का यह धागा धर्म और जाति की सीमाओं से परे होकर केवल स्नेह और कर्तव्य का संदेश देता है।
देवताओं की विजय से लेकर यमुना और यमराज के प्रसंग तक
भविष्य पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में रक्षासूत्र का उपयोग केवल भाई-बहन के रिश्ते के लिए नहीं, बल्कि युद्ध में विजय और रक्षा के लिए भी किया जाता था। जब देवताओं और असुरों के बीच बारह वर्षों तक लंबा युद्ध चला और देवताओं की पराजय होने लगी, तब देवगुरु बृहस्पति के परामर्श पर देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने सावन पूर्णिमा के दिन एक पवित्र रक्षासूत्र तैयार किया था। उस रक्षासूत्र को इंद्र की कलाई पर बांधा गया, जिसके प्रताप से देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी।
इसके अलावा, मृत्यु के देवता यमराज और नदी के रूप में पूजी जाने वाली यमुना के बीच भी रक्षाबंधन के पावन पर्व का गहरा नाता रहा है। यमुना ने जब श्रावण पूर्णिमा के दिन अपने भाई यमराज की कलाई पर रक्षा का धागा बांधा, तो वे अपनी बहन के इस स्नेह से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने यमुना को अमरता का वरदान दे दिया था। साथ ही यह भी घोषणा की गई कि जो भी भाई इस दिन अपनी बहन से रक्षासूत्र बंधवाएगा, उसे लंबी उम्र और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलेगी।
Raksha Bandhan History: महाभारत काल से लेकर भगवान गणेश के परिवार तक की कथाएं
महाभारत के कालखंड में भी भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का एक बहुत ही प्रसिद्ध प्रसंग जुड़ा हुआ है, जो इस रिश्ते की गहराई को और ज्यादा मजबूत करता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था, तब उस प्रक्रिया में उनकी उंगली कट गई थी और खून बहने लगा था। वहां मौजूद द्रौपदी ने बिना एक पल गंवाए अपनी रेशमी साड़ी का आंचल फाड़ा और कृष्ण की उंगली पर बांध दिया, जिसे भगवान ने रक्षासूत्र मानकर द्रौपदी को हर संकट में बचाने का वचन दिया था।
ऐसी ही एक अनोखी कथा गणेश पुराण में भी मिलती है, जहां भगवान गणेश के पुत्र शुभ और लाभ को जब अपनी कोई बहन नहीं होने का अहसास हुआ, तो उन्होंने अपने पिता से जिद शुरू कर दी। पुत्रों की तीव्र इच्छा को देखते हुए भगवान गणेश ने एक पवित्र यज्ञ का आयोजन किया, जिसकी अग्नि से देवी संतोषी का प्राकट्य हुआ और शुभ-लाभ को अपनी बहन मिल गई।
यह पर्व हर साल लोगों के दिलों में एक नई ऊर्जा और स्नेह भर देता है। इस बार के त्योहार को लेकर बाजारों में रौनक अभी से देखने को मिल रही है और हर कोई इसकी तैयारियों में जुटा हुआ है। मामले और इस पर्व से जुड़ी आगे की हर अपडेट पर हमारी नजर लगातार बनी हुई है।
Read More Here:-
Sanwaliya Seth Temple: श्रावण मास में 35.66 करोड़ का चढ़ावा, सोने-चांदी की भी रिकॉर्ड बरसात

[…] […]