BRICS Countries May Link UPI-Like Payment Systems: भारत की बीआरआईसीएस अध्यक्षता के दौरान सीमा पार भुगतान व्यवस्था को नया रूप देने की कोशिश तेज हो गई है। सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी और यूपीआई जैसे फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव सिर्फ तकनीकी कदम नहीं बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में रणनीतिक बदलाव का संकेत भी है।
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बीआरआईसीएस देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी को जोड़ने की संभावनाओं का जिक्र किया है। अगर यह दिशा आगे बढ़ती है तो भारत का यूपीआई रूस और अन्य सदस्य देशों के सिस्टम भविष्य में एक दूसरे से जुड़ सकते हैं। इसका सीधा असर व्यापार पर्यटन रेमिटेंस और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान पर पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय भुगतान की मौजूदा चुनौतियां
आज सीमा पार भुगतान का बड़ा हिस्सा डॉलर और कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग व्यवस्था के जरिए होता है। एक देश से दूसरे देश में पैसा भेजने में कई बैंकिंग मध्यस्थ शामिल होते हैं। इससे भुगतान महंगा पड़ जाता है और कई बार इसमें देरी भी होती है। बीआरआईसीएस देशों के बीच सीधी व्यवस्था बनने पर भारतीय कारोबारी रूस चीन ब्राजील या अन्य सदस्य देशों के साथ स्थानीय मुद्रा में लेनदेन कर सकेंगे।
वहां जाने वाले भारतीय पर्यटक भी स्थानीय फास्ट पेमेंट सिस्टम से भुगतान कर पाएंगे। लक्ष्य सिर्फ डिजिटल बनाना नहीं बल्कि कम लागत कम समय और कम मध्यस्थों वाली व्यवस्था तैयार करना है।
BRICS Countries May Link UPI-Like Payment Systems: यूपीआई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे मददगार होगा
भारत का यूपीआई घरेलू डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के चर्चित मॉडलों में शामिल है। अब भारत इसी अनुभव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना चाहता है। अगर दोनों देशों के पेमेंट सिस्टम इंटरलिंक हो जाएं तो भारतीय उपयोगकर्ता अपने बैंक खाते से भुगतान कर सकेगा और व्यापारी को स्थानीय मुद्रा में रकम मिल सकती है।
ऐसी व्यवस्था बीआरआईसीएस देशों के बीच रिटेल पेमेंट पर्यटन और रेमिटेंस को आसान बना सकती है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। यूपीआई का दूसरे सिस्टम से जुड़ना और साझा बीआरआईसीएस मुद्रा बनना दो अलग बातें हैं। भारत साझा मुद्रा के बजाय स्थानीय मुद्राओं और इंटरऑपरेबल सिस्टम पर जोर देता दिखता है।
सीबीडीसी की भूमिका और संभावित फायदे
इस पूरी व्यवस्था का अगला चरण केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी हो सकता है। अगर अलग अलग देशों के सीबीडीसी सिस्टम इंटरऑपरेबल बन जाएं तो सीमा पार भुगतान में कई पारंपरिक मध्यस्थों की जरूरत कम हो सकती है। भुगतान लगभग तत्काल हो सकता है और कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग शुल्क घट सकते हैं।
डिजिटल लेनदेन को ट्रैक करना भी आसान हो सकता है। हालांकि अभी बीआरआईसीएस के सभी प्रमुख देशों में सीबीडीसी का इस्तेमाल समान स्तर पर नहीं है। इसलिए इसे बड़े पैमाने पर लागू करना तकनीकी और नियामकीय रूप से आसान नहीं होगा।
BRICS Countries May Link UPI-Like Payment Systems: डॉलर और एसडब्ल्यूआईएफटी पर कितना असर
अगर बीआरआईसीएस देशों के बीच व्यापार का एक हिस्सा सीधे स्थानीय मुद्राओं में होने लगे तो लंबे समय में डॉलर केंद्रित व्यवस्था और एसडब्ल्यूआईएफटी पर निर्भरता घट सकती है। लेकिन इसे डॉलर के खिलाफ अभियान कहना जल्दबाजी होगी। भारत की रणनीति सावधानीपूर्ण है।
उद्देश्य डॉलर को खत्म करना नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय भुगतान के विकल्पों का विस्तार करना है। भारत ऐसी बहुध्रुवीय व्यवस्था चाहता है जिसमें डॉलर महत्वपूर्ण बना रहे लेकिन हर सीमा पार भुगतान के लिए उस पर निर्भरता अनिवार्य न हो।
भारत के लिए संभावित लाभ
सबसे बड़ा फायदा रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने का हो सकता है। अगर बीआरआईसीएस देशों के साथ व्यापार का बड़ा हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में होने लगे तो रुपये में सीमा पार लेनदेन की स्वीकार्यता बढ़ सकती है। भारतीय व्यापारियों और निर्यातकों को कम लागत और तेज भुगतान से फायदा मिलेगा।
छोटे और मध्यम कारोबारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार आसान हो सकता है। किसी एक वित्तीय नेटवर्क पर निर्भरता कम होने से भारत बाहरी झटकों और संभावित प्रतिबंधों के प्रति अधिक लचीला बन सकता है। यूपीआई और डिजिटल पेमेंट तकनीक के क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका भी मजबूत हो सकती है।
BRICS Countries May Link UPI-Like Payment Systems: चीन की भूमिका और भारत की चिंता
बीआरआईसीएस पेमेंट सिस्टम की चर्चा में चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चीन लंबे समय से युआन के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। उसका डिजिटल युआन और संबंधित वित्तीय ढांचा इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। भारत किसी ऐसे सिस्टम के पक्ष में नहीं होगा जिसमें साझा व्यवस्था व्यवहार में चीनी तकनीक या युआन के प्रभुत्व का माध्यम बन जाए।
भारत के लिए बेहतर विकल्प खुला इंटरऑपरेबल और मल्टी करेंसी फ्रेमवर्क होगा जिसमें रुपये सहित सभी सदस्य देशों की मुद्राओं के लिए समान अवसर हों। असली सवाल साझा मुद्रा का नहीं बल्कि ऐसे पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का है जिसमें किसी एक देश का वर्चस्व न हो।
बीआरआईसीएस का संभावित पेमेंट सिस्टम वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को रातोंरात नहीं बदल देगा। डॉलर की ताकत सिर्फ भुगतान प्रणाली से नहीं बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था वित्तीय बाजारों और वैश्विक नेटवर्क प्रभाव से आती है। लेकिन अगर सदस्य देश अपने फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को सफलतापूर्वक जोड़ लेते हैं तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान के विकल्प जरूर बढ़ेंगे।
भारत के लिए इसका महत्व रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण यूपीआई की वैश्विक भूमिका और रणनीतिक वित्तीय स्वायत्तता तीनों में है। यह प्रयोग उस बदलती दुनिया की ओर इशारा करता है जहां वित्तीय व्यवस्था धीरे धीरे एकध्रुवीय मॉडल से बहुध्रुवीय मॉडल की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है।Read More Here
- Abhijit Dipke Contest in Election 2029: अभिजीत दीपके का बड़ा बयान, सरकारी स्कूल सुधर गए तो 2029 लोकसभा चुनाव का मुद्दा ही नहीं बचेगा
- PNG Connection: PNG कनेक्शन पर सरकार का जोर, 1 सितंबर से नई प्रोत्साहन योजना लागू
- CM Vijay Announcement: तमिलनाडु सीएम विजय का बड़ा ऐलान, दूध 42 रुपये लीटर, स्वास्थ्य बीमा 25 लाख और हर विधायक को सरकारी गाड़ी
- Stock Market Update: सेंसेक्स-निफ्टी सपाट खुले, ऑटो-मेटल में बिकवाली

[…] […]
[…] […]