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Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक का दावा, राहुल गांधी के जरिए अनशन तुड़वाने की कोशिश हुई थी

Sonam Wangchuk Hunger Strike
Sonam Wangchuk Hunger Strike

सारांश

  • Sonam Wangchuk Hunger Strike: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है।
  • वांगचुक के मुताबिक, शुरुआती योजना बेहद सीधी-सादी थी। उनका इरादा था कि वह किसी तरह अगले कुछ दिन और अनशन जारी रखेंगे, लेकिन 20 जुलाई को साथियों के साथ मिलकर संसद तक जाएंगे और वहां सांसदों को…
  • मगर योजना जिस तरह बनाई गई थी, हकीकत में हालात उससे बिल्कुल अलग निकले।
  • दीपके के अनुसार, बाद में जो हुआ वह उनके लिए भी हैरान करने वाला था।

Sonam Wangchuk Hunger Strike: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। लगातार 36 दिनों तक अनशन पर बैठे रहे वांगचुक ने अब खुद बताया है कि 20 जुलाई को संसद तक होने वाले मार्च का असली मकसद क्या था। उनकी मंशा टकराव की नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की थी। मगर सवाल यह उठता है कि आखिर वह दिन इतना विवादों में क्यों घिर गया, जबकि वांगचुक का इरादा कुछ और ही था।

दरअसल नीट पेपर लीक के मुद्दे को लेकर चल रहे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन के बीच सोनम वांगचुक ने अपना अनशन शुरू किया था। उनकी सेहत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन वह अपनी मांगों पर अड़े रहे। अब जब उन्होंने पूरी घटना पर मुंह खोला है, तो कई नई बातें सामने आई हैं जो पहले शायद ही किसी को पता थीं।

Sonam Wangchuk Hunger Strike: 20 जुलाई को लेकर क्या था असली प्लान

वांगचुक के मुताबिक, शुरुआती योजना बेहद सीधी-सादी थी। उनका इरादा था कि वह किसी तरह अगले कुछ दिन और अनशन जारी रखेंगे, लेकिन 20 जुलाई को साथियों के साथ मिलकर संसद तक जाएंगे और वहां सांसदों को अपना ज्ञापन सौंपेंगे। इस दौरान उनके करीबी साथियों ने कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों की संख्या का अनुमान भी लगाया था। किसी ने दस हजार का आंकड़ा बताया तो किसी ने पंद्रह हजार का। मगर खुद वांगचुक को लगता था कि इस मार्च में एक लाख से भी ज्यादा लोग पहुंच सकते हैं।

यहीं से मामला थोड़ा दिलचस्प मोड़ लेता है। वांगचुक का कहना है कि उनकी योजना में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए गुंजाइश रखी गई थी। अगर सरकार की तरफ से कोई प्रतिनिधि उनसे मिलने नहीं आता, तो योजना थी कि विपक्षी सांसदों से संपर्क साधा जाए। जानकार बताते हैं कि इसी कड़ी में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा भी मंच पर मौजूद रहे थे, जिससे यह साफ होता है कि विपक्ष की भागीदारी को लेकर पहले से बातचीत चल रही थी।

राहुल गांधी से जूस पिलवाने की थी योजना

अब आते हैं इस पूरे मामले के सबसे चर्चित हिस्से पर। सोनम वांगचुक ने खुलासा किया कि उनकी असली मंशा एक सम्मानजनक ढंग से आंदोलन को खत्म करने की थी। इसके लिए तय हुआ था कि अगर सत्ता पक्ष से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलता, तो विपक्ष के किसी बड़े नेता से जूस पिलवाकर अनशन तुड़वाया जाए। इसी क्रम में राहुल गांधी का नाम सामने आया। वांगचुक चाहते थे कि कांग्रेस नेता खुद उन्हें जूस पिलाकर उपवास खत्म कराएं, ताकि आंदोलन एक गरिमापूर्ण अंत तक पहुंच सके और आगे की जिम्मेदारी विपक्ष के कंधों पर आ जाए।

मगर योजना जिस तरह बनाई गई थी, हकीकत में हालात उससे बिल्कुल अलग निकले। वांगचुक ने साफ कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इस मार्च के दौरान किसी तरह की तोड़फोड़ या हिंसा जैसी स्थिति बन जाएगी। उनका मकसद सिर्फ इतना था कि मुद्दा सांसदों तक पहुंचे और वे इसकी जिम्मेदारी लें।

यहीं पर कहानी में वह ट्विस्ट आता है जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी। वांगचुक के मुताबिक 18 तारीख को ही, यानी तय कार्यक्रम से पहले, उन्हें जबरन उठा लिया गया। यानी जिस दिन का पूरा प्लान बनाया गया था, उससे पहले ही घटनाक्रम पूरी तरह बदल चुका था।

अभिजीत दीपके ने भी दी अहम जानकारी

इस पूरे प्रकरण पर आंदोलन से जुड़े अभिजीत दीपके ने भी अपनी बात रखी है। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि सोनम वांगचुक इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके थे। उनकी गिरती सेहत को लेकर साथियों के बीच चिंता बढ़ती जा रही थी, लेकिन वांगचुक खुद अनशन तोड़ने के लिए राजी नहीं हो रहे थे।

दीपके के अनुसार, बाद में जो हुआ वह उनके लिए भी हैरान करने वाला था। उन्होंने बताया कि वांगचुक को उनकी सहमति के बिना ही वहां से ले जाया गया, यानी उनकी भाषा में “किडनैप” कर लिया गया। इसके बाद हालात ऐसे बन गए कि सिर्फ सरकार से जुड़े लोगों को ही उनसे मिलने की इजाजत मिली। खुद दीपके और उनके साथियों को मिलने तक नहीं दिया गया। ऐसे हालात में आखिरकार वांगचुक को अपने ही हाथों अनशन खत्म करना पड़ा, न कि उस तरीके से जिसकी उन्होंने कल्पना की थी।

Sonam Wangchuk Hunger Strike: आम लोगों के लिए क्यों मायने रखती है यह बात

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक व्यक्ति की निजी लड़ाई भर नहीं है। नीट पेपर लीक जैसे मुद्दे लाखों छात्रों और उनके परिवारों की जिंदगी से सीधे जुड़े होते हैं। जब कोई कार्यकर्ता 36 दिनों तक भूखा रहकर इस मुद्दे को उठाता है, तो यह आम आदमी के भरोसे और व्यवस्था पर उठते सवालों को भी सामने लाता है। वांगचुक की यह बात कि उनका इरादा शांतिपूर्ण था, इस मामले को एक नई दिशा दे सकती है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की पूरी संभावना है।

सोनम वांगचुक का यह बयान बताता है कि 20 जुलाई की घटना जितनी दिखी, हकीकत में मामला उससे कहीं ज्यादा उलझा हुआ था। जहां एक तरफ शांतिपूर्ण मार्च और सम्मानजनक अंत की योजना थी, वहीं दूसरी तरफ हालात कुछ इस तरह बदले कि नियोजित कार्यक्रम धरा का धरा रह गया। अभिजीत दीपके के बयान ने इस पूरी कहानी को एक नया आयाम दे दिया है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि आगे इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष की तरफ से क्या प्रतिक्रिया आती है।

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लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

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