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Nepal Flood 2026: भारत में भी ग्लेशियर झीलों का खतरा, सीमा के पास 200 झीलें चिह्नित

Nepal Flood 2026: भारत में भी ग्लेशियर झीलों का खतरा, सीमा के पास 200 झीलें चिह्नित
Nepal Flood 2026

सारांश

  • Nepal Flood 2026: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को हिला कर रख दिया है, और अब यही आशंका भारत को लेकर भी गहराने लगी है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वरिष्ठ सलाहकार डॉ भूपेंद्र मिली के मुताबिक भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 नदी घाटियों में कुल 28,000 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से लगभग 7,500 झीलें भारत की…
  • सिर्फ पहाड़ ही नहीं, बल्कि मैदानी इलाके भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं।
  • अब तक के आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में 768 और तिब्बत के जिरोंग इलाके में 7 लोगों की मौत हो चुकी है।

Nepal Flood 2026: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को हिला कर रख दिया है, और अब यही आशंका भारत को लेकर भी गहराने लगी है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में तिब्बत की एक ग्लेशियर झील के टूटने से आई तबाही ने अब तक 768 लोगों की जान ले ली है, जबकि 2,500 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि जिस तरह की झील की वजह से नेपाल में यह प्रलय आया, ठीक वैसी ही करीब 200 झीलें भारतीय सीमा के बेहद नजदीक मौजूद हैं। सवाल यही उठता है कि क्या भारत के पहाड़ी राज्य और मैदानी इलाके भी किसी बड़े खतरे की जद में हैं?

रुक-रुक कर हो रही बारिश और तिब्बत में नदी के उद्गम स्थल के पास एक नई अस्थायी झील बनने से भोटेकोशी का जलस्तर फिर बढ़ने लगा है। इसी वजह से नेपाल के निचले इलाकों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। नेपाल की यह त्रासदी अब भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक ‘वाटर बमों’ को लेकर भी खतरे की घंटी बजा रही है।

Nepal Flood 2026: भारत में कितनी ग्लेशियर झीलें बनी हुई हैं खतरा

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वरिष्ठ सलाहकार डॉ भूपेंद्र मिली के मुताबिक भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 नदी घाटियों में कुल 28,000 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से लगभग 7,500 झीलें भारत की सीमा में स्थित हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा घनत्व गंगा बेसिन का है, जहां अकेले 4,700 से अधिक झीलें मौजूद हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएमए ने इनमें से 195 से 200 झीलों को उच्च जोखिम यानी ए-श्रेणी में चिह्नित किया है। जानकार बताते हैं कि अगर इन झीलों का समय रहते सही ढंग से प्रबंधन नहीं किया गया, तो पहाड़ों के साथ-साथ उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के मैदानी इलाकों में भी अभूतपूर्व जलप्रलय आने का खतरा बना रहेगा।

नेपाल में आखिर इतनी भीषण तबाही क्यों मची

मामला कुछ इस तरह से है कि तिब्बत और नेपाल के बेहद संवेदनशील इलाकों में पर्यावरण और भौगोलिक हालात की अनदेखी करते हुए लंबे समय से अनियंत्रित निर्माण होता रहा। इसके अलावा नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में ही बस्तियां बस गईं, और जब पानी का सैलाब आया तो अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी ईडब्ल्यूएस ने समय पर काम नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि पानी और मलबे को निकलने के लिए कोई रास्ता नहीं मिला, जिससे जान-माल का नुकसान कई गुना बढ़ गया। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब भारत में भी इसी तरह की चूक न होने की चेतावनी दे रहे हैं।

किन भारतीय राज्यों पर मंडरा रहा है सबसे ज्यादा खतरा

देखने पर लगता है कि हिमाचल प्रदेश की स्थिति इस मामले में सबसे संवेदनशील है, जहां सतलुज, ब्यास और चिनाब बेसिन में 48 उच्च जोखिम वाली झीलें मौजूद हैं। इसके बाद सिक्किम का नंबर आता है, जहां तीस्ता बेसिन में साउथ ल्होनक झील समेत 40 झीलें खतरनाक श्रेणी में रखी गई हैं। लद्दाख में सिंधु और जांस्कर घाटी के आसपास 35 झीलें हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश में दिबांग और सुबनसिरी बेसिन में 28 झीलें चिह्नित की गई हैं। जम्मू-कश्मीर के झेलम और चिनाब बेसिन में 26 झीलें, वहीं उत्तराखंड के अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में 13 झीलें उच्च जोखिम की सूची में शामिल हैं।

सिर्फ पहाड़ ही नहीं, बल्कि मैदानी इलाके भी इस खतरे से अछूते नहीं हैं। अगर नेपाल या सिक्किम की झीलें भविष्य में फटती हैं, तो कोसी, गंडक और तीस्ता जैसी नदियों के जरिए उत्तर बिहार के सुपौल, सहरसा, मधुबनी और चंपारण जैसे जिलों के साथ-साथ उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग तराई क्षेत्र में भी लाखों क्यूसेक पानी और गाद पहुंच सकता है, जिससे तटबंध टूटने का खतरा बना रहता है।

अब सरकार बचाव के लिए क्या कदम उठा रही है

इस पूरे संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने कुछ ठोस तैयारियां शुरू कर दी हैं। सभी 200 संवेदनशील झीलों के लिए हैजार्ड जोनिंग मैपिंग की जा रही है, ताकि असुरक्षित इलाकों में निर्माण और बसावट पर रोक लगाई जा सके। इसके अलावा झीलों के मुहाने पर चेक डैम, ड्रेनेज सिस्टम और डिफ्लेक्शन स्ट्रक्चर जैसे इंजीनियरिंग उपाय भी तैयार किए जा रहे हैं, जो पानी को सुरक्षित दिशा में मोड़ सकें। सबसे अहम बात यह है कि अगले दो वर्षों में सभी उच्च जोखिम वाली झीलों पर ऑटोमैटिक अर्ली वार्निंग सेंसर लगाने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि सैटेलाइट के जरिए 24 घंटे निगरानी हो सके और किसी भी खतरे की सूचना समय रहते मिल जाए।

नेपाल में लापता मजदूरों की तलाश अब भी जारी

नेपाल में इस आपदा का असर सिर्फ जान-माल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने ऊर्जा क्षेत्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आई बाढ़ से नेपाल के 14 पनबिजली संयंत्र क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिससे वहां की 431 मेगावाट यानी 12 प्रतिशत से ज्यादा बिजली उत्पादन क्षमता ठप पड़ गई है। रसुवा और त्रिशूली की भूमिगत सुरंगों में कीचड़ भर जाने से 500 से ज्यादा जलविद्युत कर्मचारी और मजदूर अब भी लापता बताए जा रहे हैं। भारत से पहुंची 11 सदस्यीय विशेषज्ञ टीम त्रिशूली-3ए परियोजना स्थल पर रेस्क्यू अभियान में जुटी हुई है।

अब तक के आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में 768 और तिब्बत के जिरोंग इलाके में 7 लोगों की मौत हो चुकी है। लापता लोगों की संख्या 2,500 से ज्यादा बताई जा रही है, जिनमें कम से कम 320 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। इनमें 287 भारतीय और 128 भारतीय मूल के लोग भी लापता हैं। राहत की बात यह है कि अब तक 4,400 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जिनमें 167 भारतीय भी शामिल हैं।

Nepal Flood 2026: नेपाल की अर्थव्यवस्था पर पड़ा भारी असर

इस त्रासदी ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को भी बड़ा झटका दिया है। बुनियादी ढांचे, जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों और रिहायशी इलाकों के तबाह होने से पुनर्निर्माण पर करीब 4.5 अरब डॉलर, यानी लगभग 37,500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह रकम नेपाल की कुल जीडीपी के लगभग दसवें हिस्से के बराबर है। यही वजह है कि नेपाल सरकार ने भारत सहित पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बड़े आर्थिक सहयोग की अपील की है।

कुल मिलाकर नेपाल की यह आपदा सिर्फ एक पड़ोसी देश का संकट भर नहीं है, बल्कि भारत के लिए भी एक सीधी चेतावनी है। हिमाचल, सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे राज्यों के साथ-साथ उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के मैदानी इलाके भी इन ग्लेशियर झीलों के खतरे की जद में आते हैं। ऐसे में समय रहते निगरानी तंत्र और चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करना ही इस तरह की तबाही से बचने का सबसे कारगर रास्ता माना जा रहा है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि सरकार अगले दो वर्षों के भीतर तय किए गए सुरक्षा उपायों को कितनी तेजी से जमीन पर उतार पाती है।

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लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

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