संक्षेप में: अक्टूबर से जनवरी के बीच उत्तर भारत में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) बताता है कि हवा कितनी खराब है और उसका सेहत पर क्या असर हो सकता है। इस लेख में AQI की श्रेणियां, GRAP के चरण और वायु प्रदूषण से बचाव के व्यावहारिक तरीके हैं।
AQI क्या है और इसकी श्रेणियां
राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक 2015 में शुरू हुआ। इसमें PM2.5, PM10, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, अमोनिया और लेड जैसे आठ प्रदूषकों के आधार पर एक अंक निकाला जाता है। जिस प्रदूषक का स्तर सबसे खराब होता है, वही कुल AQI तय करता है। CPCB के अनुसार श्रेणियां और संभावित असर इस प्रकार हैं:
- 0-50 (अच्छा): न्यूनतम असर।
- 51-100 (संतोषजनक): संवेदनशील लोगों को सांस लेने में हल्की तकलीफ।
- 101-200 (मध्यम): फेफड़े, अस्थमा और हृदय रोगियों को तकलीफ।
- 201-300 (खराब): लंबे समय तक संपर्क में रहने पर ज्यादातर लोगों को सांस लेने में तकलीफ।
- 301-400 (बहुत खराब): लंबे संपर्क से सांस की बीमारी।
- 401-500 (गंभीर): स्वस्थ लोगों पर भी असर और पहले से बीमार लोगों पर गंभीर असर।
वायु प्रदूषण की स्थिति जानने के लिए अपने शहर का AQI CPCB की वेबसाइट या उसके SAMEER ऐप पर देखा जा सकता है।
दिल्ली-एनसीआर में GRAP के चार चरण
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) लागू करता है। अक्टूबर 2026 तक लागू ढांचे में इसके चार चरण हैं: चरण 1 “खराब” (AQI 201-300), चरण 2 “बहुत खराब” (301-400), चरण 3 “गंभीर” (401-450) और चरण 4 “गंभीर प्लस” (450 से ऊपर)। वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ हर चरण में निर्माण कार्य, डीजल जनरेटर, पुराने वाहनों और ट्रकों की आवाजाही पर अलग-अलग पाबंदियां लगती हैं। चरण 4 में जरूरी सामान ले जाने वाले ट्रकों को छोड़कर बाकी ट्रकों का दिल्ली में प्रवेश रोका जाता है।
वायु प्रदूषण का सेहत पर असर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार वायु प्रदूषण स्ट्रोक, हृदय रोग, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), फेफड़ों के कैंसर और सांस के संक्रमण के खतरे से जुड़ा है। बेहद बारीक कण PM2.5 फेफड़ों में गहराई तक जा सकते हैं। WHO के 2021 के दिशानिर्देशों में PM2.5 का 24 घंटे का औसत 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम रखने की सलाह है, जबकि भारत का राष्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम है। वायु प्रदूषण से बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और सांस या दिल की बीमारी वाले लोग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।
वायु प्रदूषण से बचाव के व्यावहारिक तरीके
- AQI देखकर योजना बनाएं: AQI खराब या उससे ऊपर हो, तो सुबह-शाम की लंबी सैर, दौड़ या बाहर कसरत कम करें या घर के अंदर करें।
- सही मास्क: कपड़े के मास्क बारीक कणों को ठीक से नहीं रोकते। बाहर जाना जरूरी हो तो ठीक से फिट होने वाला N95 जैसा मास्क बेहतर विकल्प माना जाता है।
- घर के अंदर की हवा: ज्यादा प्रदूषण वाले घंटों में खिड़कियां बंद रखें, घर में धूप-अगरबत्ती, लकड़ी या कोयला जलाने से बचें और धूम्रपान न करें।
- कचरा न जलाएं: पत्ते या कचरा जलाना प्रदूषण बढ़ाता है और कई जगह जुर्माने का प्रावधान है।
- दवाएं साथ रखें: अस्थमा या COPD के मरीज अपनी दवाएं और इनहेलर नियमित रखें और लक्षण बढ़ने पर डॉक्टर से संपर्क करें।
मौसम बदलने पर खानपान से जुड़ी हमारी रिपोर्ट बदलते मौसम में आंवला और नींद और दिनचर्या पर डॉक्टर की राय भी पढ़ें। ध्यान रखें कि कोई भी खाद्य पदार्थ प्रदूषण से होने वाले नुकसान को रोकने का विकल्प नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
AQI 300 से ऊपर हो तो क्या करें?
बाहर की गतिविधियां सीमित करें, बच्चों और बुजुर्गों को खास सावधानी बरतने दें और बाहर निकलते समय अच्छा मास्क पहनें।
क्या एयर प्यूरीफायर जरूरी है?
यह बंद कमरे में बारीक कण कम कर सकता है, लेकिन कमरे के आकार के हिसाब से सही क्षमता वाला होना चाहिए। यह बाहर की हवा का समाधान नहीं है।
सर्दियों में वायु प्रदूषण ज्यादा क्यों होता है?
ठंड में हवा की रफ्तार कम होती है और जमीन के पास ठंडी हवा की परत प्रदूषकों को ऊपर उठने नहीं देती, जिससे वे जमा हो जाते हैं।
स्रोत: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (AQI), वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (GRAP), विश्व स्वास्थ्य संगठन। यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है, चिकित्सा सलाह नहीं।





