Lung Tumor: कैंसर अनुसंधान और ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक क्रांतिकारी और आशाजनक वैज्ञानिक खोज सामने आई है। अमेरिका स्थित विश्वविख्यात ‘जॉन्स हॉपकिन्स किमेल कैंसर सेंटर’ और इसके ‘ब्लूमबर्ग किमेल इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर इम्यूनोथेरेपी’ के वरिष्ठ शोधकर्ताओं ने यह सिद्ध किया है कि फेफड़ों के ट्यूमर के भीतर स्वाभाविक रूप से पाए जाने वाले विशिष्ट बैक्टीरिया, विटामिन बी2 (राइबोफ्लेविन) के एक सक्रिय मेटाबोलाइट के साथ मिलकर मानव शरीर की जन्मजात प्रतिरक्षा कोशिकाओं (इनेट इम्यून सेल्स) को तेजी से सक्रिय कर सकते हैं।
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (PNAS) में प्रकाशित यह अभूतपूर्व शोध कैंसर के विरुद्ध एक सर्वथा नई श्रेणी की इम्यूनोथेरेपी विकसित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस अध्ययन के अनुसार, ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट के अंदर मौजूद बैक्टीरिया और विटामिन बी2 मेटाबोलाइट का परस्पर तालमेल एंटीजन पेश करने वाली कोशिकाओं (APCs) पर एमआर1 (MR1) नामक विशेष प्रोटीन की सतह अभिव्यक्ति को कई गुना बढ़ा देता है। इससे शरीर की विशिष्ट म्यूकोसल एसोसिएटेड इनवेरिएंट टी (MAIT) कोशिकाएं सक्रिय होकर सीधे कैंसर ट्यूमर पर हमला करने और दुर्दांत कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में सक्षम हो जाती हैं।
Lung Tumor: कैंसर इम्यूनोथेरेपी में नई दिशा: जन्मजात MAIT कोशिकाओं की अनदेखी शक्ति
पारंपरिक ऑन्कोलॉजी में अब तक विकसित की गई अधिकांश उन्नत इम्यूनोथेरेपी तकनीकें मुख्य रूप से शरीर की एडाप्टिव इम्यून सिस्टम से जुड़ी टी-कोशिकाओं (CD8+ T-cells) को पुनः सक्रिय करने पर केंद्रित रही हैं। इन मौजूदा उपचारों का उद्देश्य टी-कोशिकाओं को इस प्रकार प्रशिक्षित करना होता है कि वे ट्यूमर कोशिकाओं के विशिष्ट एंटीजन को पहचान कर उन पर प्रहार कर सकें। हालांकि, इस प्रक्रिया में मानव प्रतिरक्षा प्रणाली की जन्मजात सुरक्षा पंक्ति यानी एमएआईटी (MAIT) कोशिकाओं पर अब तक बहुत सीमित ध्यान दिया गया था।
एमएआईटी कोशिकाएं हमारे शरीर की म्यूकोसल परतों (जैसे फेफड़े, आंत और श्वास नली) में प्राथमिक सुरक्षा प्रहरी की तरह तैनात रहती हैं, जो किसी भी बाहरी चोट या रोगाणु संक्रमण की स्थिति में सबसे पहले प्रतिक्रिया देती हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में ऑन्कोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर और फ्रेंच नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल रिसर्च के रिसर्च डायरेक्टर फ्रैंक हाउसेउ के अनुसार, यह शोध एक ऐसा नया आयाम खोलता है जहां माइक्रोबायोम और विटामिन बी2 मेटाबोलाइट का संयोजन एमआर1 प्रोटीन की अभिव्यक्ति को बढ़ाकर एमएआईटी कोशिकाओं को ट्यूमर की ओर निर्देशित करता है।
शोध के मुख्य वैज्ञानिक निष्कर्ष और अप्रत्याशित परिणाम
शोध दल ने अपने निष्कर्षों को प्रमाणित करने के लिए फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित मरीजों के ट्यूमर नमूनों की माइक्रोबायोम सीक्वेंसिंग, प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सिंगल-सेल आरएनए सीक्वेंसिंग और जटिल सेल कल्चर प्रयोगों का एक व्यापक त्रिस्तरीय अध्ययन किया। इस गहन विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों को एक अत्यंत आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित परिणाम देखने को मिला।
शोधकर्ताओं की प्रारंभिक वैज्ञानिक परिकल्पना यह थी कि केवल वही बैक्टीरिया प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को सक्रिय करेंगे जो स्वयं विटामिन बी2 मेटाबोलाइट का संश्लेषण करते हैं। किंतु प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ कि एंटरोकोकस प्रजाति के वे बैक्टीरिया भी, जो स्वयं विटामिन बी2 मेटाबोलाइट नहीं बना सकते (ऑक्सोट्रॉफिक), बाहरी रूप से बी2 मेटाबोलाइट (5-OP-RU) की सूक्ष्म मात्रा मिलाए जाने पर एमएआईटी कोशिकाओं की आक्रामकता और सक्रियता को नाटकीय रूप से बढ़ा देते हैं।
कैंसर इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. पाखी बिरला, जिन्होंने इस ऐतिहासिक अध्ययन का मुख्य नेतृत्व किया, ने स्पष्ट किया कि ट्यूमर से जुड़े बैक्टीरिया एंटीजन प्रेजेंटिंग सेल्स पर एमआर1 प्रोटीन की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करके ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट में एमएआईटी कोशिकाओं को शक्तिशाली एंटी-ट्यूमर प्रभाव पैदा करने के लिए प्रेरित करते हैं। डॉ. बिरला ने यह शोध कार्य प्रोफेसर फ्रैंक हाउसेउ और ब्लूमबर्ग किमेल इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर इम्यूनोथेरेपी के निदेशक डॉ. ड्रू पार्डोल की प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में डॉक्टरेट शोध के दौरान सफलतापूर्वक संपन्न किया।
मरीजों के क्लिनिकल अनुभव और अंतःविषय सहयोग की बड़ी भूमिका
इस ऐतिहासिक वैज्ञानिक खोज की प्राथमिक प्रेरणा फेफड़ों के कैंसर के उन वास्तविक रोगियों के क्लिनिकल डेटा से प्राप्त हुई थी, जिन्हें सर्जरी से पूर्व ‘नियोएडजुवेंट पीडी-1 ब्लॉकेड’ (एंटी-पीडी-1) इम्यूनोथेरेपी दी गई थी। चिकित्सकों ने देखा कि जिन रोगियों ने इस थेरेपी के प्रति असाधारण और चमत्कारी सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई, उनके ट्यूमर ऊतकों में एमएआईटी कोशिकाओं का घनत्व और सक्रियता सामान्य मरीजों की तुलना में अत्यधिक उच्च स्तर पर दर्ज की गई थी।
इस व्यापक शोध को सफल बनाने में विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के आपसी समन्वय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें म्यूकोसल इम्यूनोलॉजी के विशेषज्ञ प्रोफेसर हाउसेउ, ट्यूमर इम्यूनोलॉजी के अग्रणी वैज्ञानिक डॉ. ड्रू पार्डोल, संक्रामक रोगों की प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. सिंथिया एल. सियर्स और ऑन्कोलॉजी विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. फाइजा वाई. शैख का बहुमूल्य योगदान शामिल रहा।
‘ऑफ-द-शेल्फ’ सार्वभौमिक कैंसर थेरेपी की दिशा में क्रांतिकारी कदम
वर्तमान समय में उपलब्ध व्यक्तिगत इम्यूनोथेरेपी (जैसे सीएआर-टी सेल थेरेपी) प्रत्येक मरीज के विशिष्ट ट्यूमर म्यूटेशन और व्यक्तिगत जीनोमिक प्रोफाइल के आधार पर तैयार की जाती हैं। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल, अत्यधिक समय लेने वाली और लाखों रुपये खर्च वाली होती है, जिसके कारण यह आम कैंसर रोगियों की पहुंच से पूरी तरह बाहर रह जाती है। इसके विपरीत, एमआर1 (MR1) प्रोटीन आधारित दृष्टिकोण चिकित्सा जगत में एक सार्वभौमिक ‘ऑफ-द-शेल्फ’ (रेडीमेड) थेरेपी के रूप में विकसित होने की असीम संभावनाएं रखता है।
चूंकि एमआर1 प्रोटीन मानव आबादी में आनुवंशिक रूप से अत्यधिक संरक्षित (मोनोमॉर्फिक) होता है और अलग-अलग व्यक्तियों में बदलता नहीं है, इसलिए एमआर1 को लक्षित करने वाली टी-सेल थेरेपी लगभग हर मरीज के लिए बिना किसी व्यक्तिगत अनुकूलन के समान रूप से काम कर सकती है। प्रोफेसर हाउसेउ ने रेखांकित किया कि यदि प्री-क्लिनिकल परीक्षण पूर्णतः सफल रहते हैं, तो यह तकनीक एक ऐसी ‘ट्यूमर-एग्नोस्टिक’ थेरेपी बन जाएगी जो विभिन्न प्रकार के कैंसर ट्यूमर्स में हर मरीज के लिए सुलभ और किफायती होगी।
Lung Tumor: ट्यूमर माइक्रोबायोम की नई समझ और कैंसर के खिलाफ भविष्य का रोडमैप
पारंपरिक रूप से चिकित्सा विज्ञान में यह धारणा रही थी कि ट्यूमर के भीतर बैक्टीरिया की उपस्थिति केवल संक्रमण और ऊतकों के क्षरण का कारण बनती है। किंतु जॉन्स हॉपकिन्स की इस खोज ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ट्यूमर माइक्रोबायोम के कुछ चुनिंदा बैक्टीरिया यदि सही पोषक तत्वों और विटामिन बी2 मेटाबोलाइट्स के साथ अनुकूलित हों, तो वे शरीर के आंतरिक सुरक्षा तंत्र को कैंसर के खात्मे के लिए एक शक्तिशाली हथियार में बदल सकते हैं।
शोध दल ने अब प्रयोगशाला में पशु मॉडलों (चूहों) पर इसके प्री-क्लिनिकल ट्रायल तेजी से शुरू कर दिए हैं, जिसके अंतर्गत फेफड़ों के ट्यूमर में सीधे बी2 मेटाबोलाइट इंजेक्ट करके ट्यूमर सिकुड़ने की दर का सूक्ष्म अध्ययन किया जा रहा है। फेफड़ों का कैंसर भारत सहित दुनिया भर में कैंसर जनित मौतों का एक बड़ा कारण बना हुआ है। ऐसे में विटामिन बी2 जैसे सुरक्षित, प्राकृतिक पोषक तत्व और माइक्रोबायोम आधारित इस नवीन इम्यूनोथेरेपी का विकास आने वाले वर्षों में वैश्विक ऑन्कोलॉजी उपचार की दिशा को पूरी तरह बदलने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
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