रक्षा बंधन का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का प्रतीक है। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को यह पर्व पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन को उपहार देते हैं और जीवनभर उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। हालांकि, हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में रक्षा बंधन का पर्व मनाने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। पंचांग के अनुसार, किसी भी शुभ कार्य में भद्रा काल का विचार करना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि भद्रा में किया गया कोई भी मांगलिक कार्य शुभ फल प्रदान नहीं करता।
वर्ष 2026 में रक्षा बंधन को लेकर श्रद्धालुओं के लिए एक बेहद अच्छी खबर सामने आई है। प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित मदनमोहन के अनुसार, इस साल रक्षा बंधन के दिन बहनों को राखी बांधने के लिए भद्रा के समाप्त होने का लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। 2026 में भद्रा काल सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा, जिससे रक्षा बंधन का पूरा दिन शुभ और बाधा रहित रहेगा। आइए विस्तार से समझते हैं कि भद्रा कौन हैं, पंचांग में उन्हें विष्टि करण के रूप में क्यों स्थान मिला और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में राखी बांधना क्यों वर्जित माना गया है।
Rakhi Muhurat: कौन हैं भद्रा और क्या है इनका पौराणिक परिचय?
हिंदू ज्योतिष और पंचांग गणना में भद्रा का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। पंचांग के मुख्य पांच अंग होते हैं- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। पंचांग के 11 करणों में से 7वें करण यानी ‘विष्टि करण’ को ही भद्रा कहा जाता है। पौराणिक कथाओं और शास्त्रों के अनुसार, भद्रा भगवान सूर्यदेव और माता छाया की पुत्री हैं तथा न्याय के देवता शनिदेव की सगी बहन हैं। भद्रा का स्वरूप अत्यंत उग्र, भयंकर और डरावना वर्णित किया गया है। शास्त्रों में उनके रूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि उनका वर्ण काला, केश लंबे और बड़े-बड़े दांत हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा का जन्म दैत्यों के संहार के लिए हुआ था, लेकिन जन्म लेते ही उनका स्वभाव अत्यंत चंचल और उग्र हो गया। वे शुभ कार्यों, यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न डालने लगीं। भद्रा के इस उग्र और विनाशकारी स्वभाव को देखकर स्वयं ब्रह्मा जी चिंता में पड़ गए। सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए ब्रह्मा जी ने भद्रा को समझाया और उन्हें समय के एक विशेष चक्र यानी पंचांग के विष्टि करण में स्थान दे दिया। ब्रह्मा जी ने भद्रा से कहा कि जो भी व्यक्ति उनके समय (विष्टि करण) में कोई शुभ या मांगलिक कार्य करेगा, उसमें विघ्न उत्पन्न होगा। इस तरह भद्रा का प्रभाव समय के एक सीमित हिस्से तक ही सीमित कर दिया गया।
ज्योतिष शास्त्र में भद्रा के निवास स्थान का भी गहरा अध्ययन किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार भद्रा तीनों लोकों—स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी—में भ्रमण करती रहती हैं। जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में होता है, तब भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर माना जाता है। ज्योतिष में यह नियम है कि जब भद्रा पृथ्वी पर निवास करती हैं, तब उनका असर इंसानों पर सबसे ज्यादा होता है। इसलिए इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और रक्षा बंधन जैसे मांगलिक कार्यों को करने की सख्त मनाही होती है।
Rakhi Muhurat: पंचांग में भद्रा का स्थान और कब-कब बनती है यह स्थिति?
ज्योतिषीय गणना के आधार पर पंचांग में भद्रा की उपस्थिति तिथियों के अनुसार तय होती है। पंचांग में तिथियों को दो पक्षों—शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में बांटा गया है। भद्रा की स्थिति को समझने के लिए पंचांग की तिथियों के पूर्वार्द्ध (पहला आधा भाग) और उत्तरार्द्ध (दूसरा आधा भाग) का हिसाब लगाया जाता है।
शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा रहती है, जबकि चतुर्थी और एकादशी तिथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा का प्रभाव रहता है। दूसरी ओर, कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी तिथि के उत्तरार्द्ध में भद्रा सक्रिय होती है, वहीं सप्तमी और चतुर्दशी तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा का वास होता है।
शास्त्रों में भद्रा को दो प्रमुख अंगों में बांटकर भी देखा जाता है, जिन्हें ‘भद्रा मुख’ और ‘भद्रा पुच्छ’ कहा जाता है। भद्रा के मुख भाग को अत्यंत उग्र, विनाशकारी और अशुभ माना गया है, जिसमें किसी भी प्रकार का कार्य करना पूरी तरह वर्जित है। वहीं भद्रा के पुच्छ भाग को थोड़ा सौम्य माना जाता है और विशेष परिस्थितियों में इसमें कुछ कार्य किए जा सकते हैं। हालांकि, रक्षा बंधन जैसे अति-संवेदनशील और पवित्र त्योहार पर किसी भी जोखिम से बचने के लिए संपूर्ण भद्रा काल का त्याग करने का विधान है। रक्षा बंधन हमेशा श्रावण पूर्णिमा को पड़ता है, इसलिए इस दिन भद्रा का विचार विशेष रूप से किया जाता है।
Rakhi Muhurat: भद्रा काल में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? जानिए पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में भद्रा काल को अत्यंत अशुभ समय माना गया है। शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि भद्रा में बांधी गई राखी भाई के लिए कष्टकारी हो सकती है और इससे रिश्ते में नकारात्मकता आती है। इस मान्यता के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा लंकापति रावण और उसकी बहन शूर्पणखा से जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथा के अनुसार, रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल के दौरान ही अपने भाई रावण की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। भद्रा के अशुभ प्रभाव के कारण रावण का अहंकार चरम पर पहुंच गया, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसने सीता माता का हरण कर लिया। परिणामस्वरूप, भगवान श्री राम के हाथों रावण और उसके पूरे कुल का सर्वनाश हो गया। इसी पौराणिक घटना के बाद से यह परंपरा बन गई कि कोई भी बहन भद्रा काल के दौरान अपने भाई को राखी नहीं बांधेगी।
इसके अतिरिक्त, एक अन्य पौराणिक मान्यता यह भी है कि भद्रा के प्रभाव से रक्षा सूत्र की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह भाई की रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। इसलिए, सदियों से सनातन धर्म में बुजुर्ग और पंडित रक्षा बंधन के दिन भद्रा काल समाप्त होने का विशेष इंतजार करते हैं ताकि भाई का जीवन सुरक्षित और समृद्ध बना रहे।
Rakhi Muhurat: रक्षा बंधन 2026 में भद्रा की स्थिति: बहनों के लिए राहत की खबर
साल 2026 का रक्षा बंधन बहनों और भाइयों दोनों के लिए बेहद खास और शुभ रहने वाला है। कई वर्षों बाद ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है जब रक्षा बंधन के दिन भद्रा का साया सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा।
वर्ष 2026 में श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह लगभग 09:08 बजे शुरू होगी और 28 अगस्त 2026 को सुबह लगभग 09:48 बजे समाप्त होगी। सनातन धर्म में त्योहार उदया तिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) के अनुसार मनाए जाते हैं, इसलिए रक्षा बंधन का पर्व 28 अगस्त 2026, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा।
आचार्य मदनमोहन के अनुसार, भद्रा काल 27 अगस्त को सुबह पूर्णिमा तिथि शुरू होने के साथ ही सुबह लगभग 09:08 बजे लगेगा और रात को लगभग 09:32 बजे समाप्त हो जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि 28 अगस्त को जब सूर्योदय होगा, तब भद्रा पूरी तरह से समाप्त हो चुकी होगी। इस कारण 28 अगस्त को पूरे दिन रक्षा बंधन का त्योहार बिना किसी भद्रा के साये के मनाया जा सकेगा। इससे बहनों को शुभ मुहूर्त के लिए घंटों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
Rakhi Muhurat: रक्षा बंधन 28 अगस्त 2026 का शुभ मुहूर्त और सावधानियां
हालांकि 28 अगस्त को भद्रा की कोई बाधा नहीं है, फिर भी शास्त्रानुसार राखी बांधने के लिए शुभ चौघड़िया और मुहूर्त का ध्यान रखना उत्तम माना जाता है। 28 अगस्त 2026 को पूर्णिमा तिथि सुबह 09:48 बजे तक रहेगी। इस दिन प्रातः काल 05:57 बजे से लेकर सुबह 09:48 बजे तक का समय राखी बांधने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यदि कोई कारणवश सुबह राखी नहीं बांध पाता है, तो दोपहर में अभिजीत मुहूर्त के दौरान भी रक्षा सूत्र बांधा जा सकता है।
राखी बांधते समय कुछ जरूरी सावधानियों का पालन करना चाहिए। सबसे पहले दिन के राहुकाल का त्याग करें और उस समय कोई भी मांगलिक कार्य न करें। पूजा की थाली में रोली, अक्षत (बिना टूटे चावल), आरती का दीपक, मिठाई और राखी सजाएं। राखी बांधते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। भाई को अपना सिर किसी कपड़े या रुमाल से ढककर रखना चाहिए, और बहनें भाई के तिलक लगाकर रक्षा मंत्र का पाठ करते हुए कलाई पर राखी बांधें।
Rakhi Muhurat: रक्षा बंधन का सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक महत्व
रक्षा बंधन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या धागा बांधने की रस्म भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का हिस्सा है जो रिश्तों की मर्यादा और समर्पण को दर्शाती है। यह त्योहार भाई-बहन के बीच के पवित्र रिश्ते को और अधिक गहरा बनाता है।
आधुनिक समय में, जब लोग काम और व्यस्तताओं के कारण एक-दूसरे से दूर हो रहे हैं, रक्षा बंधन जैसा पर्व पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधने का काम करता है। भद्रा जैसे नियमों का पालन हमें यह सिखाता है कि जीवन में समय प्रबंधन, अनुशासन और धार्मिक नियमों का पालन करना कितना आवश्यक है। सही मुहूर्त और सकारात्मक भावना के साथ मनाया गया त्योहार घर में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आता है। इस साल 2026 में भद्रा से मुक्त रक्षा बंधन सभी के जीवन में खुशियां लेकर आएगा।
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