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Jitiya Vrat 2026: नहाय-खाय से पारण तक जानें जितिया व्रत की सही तारीख, पूजा मुहूर्त और धार्मिक महत्व

Jitiya Vrat 2026: नहाय-खाय से पारण तक जानें जितिया व्रत की सही तारीख, पूजा मुहूर्त और धार्मिक महत्व

सारांश

  • Jitiya Vrat 2026: जितिया व्रत 2026: 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। Drik Panchang
  • अष्टमी तिथि: 3 अक्टूबर सुबह 7:59 बजे शुरू होगी। Drik Panchang
  • 2 अक्टूबर को नहाय-खाय के साथ पर्व की शुरुआत होगी।
  • 3 अक्टूबर को माताएं संतान के कल्याण और दीर्घायु की कामना से निर्जला व्रत रखेंगी।
  • व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा और जितिया व्रत कथा का महत्व माना जाता है।
  • 4 अक्टूबर को अष्टमी समाप्त होने के बाद पारण किया जाएगा; स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
  • जितिया व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में प्रचलित है।

Jitiya Vrat 2026: सनातन धर्म में संतान के कल्याण, रक्षा और दीर्घायु के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले व्रतों में जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आम बोलचाल में जितिया या जिउतिया कहा जाता है, का स्थान सर्वोपरि माना गया है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में मातृत्व, समर्पण और तपस्या का अप्रतिम उदाहरण है। धार्मिक नियमों के अनुसार यह व्रत अत्यंत कठिन और संयम की मांग करने वाला होता है, क्योंकि इसमें लगभग 24 घंटे से अधिक समय तक बिना अन्न और जल के कठोर निर्जला उपवास रखा जाता है। प्रत्येक वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह पावन अनुष्ठान संपन्न होता है। इस वर्ष तिथियों के संधिकाल के कारण व्रती माताओं में तारीख को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई थी, किंतु प्रमुख पंचांगीय गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 में जितिया का मुख्य निर्जला व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को ही रखा जाएगा।

इस लोकपर्व का आयोजन तीन दिनों तक एक व्यवस्थित धार्मिक चक्र के रूप में चलता है। इसकी औपचारिक शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के साथ होती है, जिसके उपरांत अष्टमी तिथि को मुख्य निर्जला उपवास रखा जाता है और नवमी तिथि के सूर्योदय के पश्चात पारण कर अनुष्ठान का समापन होता है।

Jitiya Vrat 2026: जितिया व्रत 2026 की सही तिथि और पंचांग गणना

वर्ष 2026 में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 3 अक्टूबर की प्रातः 7 बजकर 59 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन 4 अक्टूबर की प्रातः 5 बजकर 51 मिनट तक प्रभावी रहेगी। चूंकि जितिया व्रत में सायंकालीन प्रदोष काल की पूजा का सर्वाधिक महत्व होता है और 3 अक्टूबर की शाम को अष्टमी तिथि पूर्ण रूप से व्याप्त रहेगी, इसलिए धर्मशास्त्रों और पंचांग विदों ने 3 अक्टूबर को ही जीवित्पुत्रिका व्रत रखने का सर्वसम्मत निर्णय दिया है।

जो लोग 4 अक्टूबर की तारीख को लेकर भ्रमित हैं, उन्हें यह समझना आवश्यक है कि 4 अक्टूबर को सूर्योदय से पूर्व ही अष्टमी तिथि समाप्त होकर नवमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। इसलिए उदयातिथि और प्रदोष काल के ज्योतिषीय सिद्धांतों के आधार पर 3 अक्टूबर का दिन ही मुख्य उपवास और पूजा के लिए पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।

2 अक्टूबर को नहाय-खाय के साथ पर्व का शुभारंभ

जितिया पर्व का पहला चरण सप्तमी तिथि यानी शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को नहाय-खाय के साथ शुरू होगा। इस दिन व्रती महिलाएं सुबह पवित्र नदियों, सरोवरों अथवा घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर सूर्य देव और कुलदेवता का पूजन करती हैं। इसके पश्चात पूर्णतः सात्विक भोजन तैयार कर ग्रहण किया जाता है, जिसमें लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक तत्व का प्रयोग वर्जित रहता है।

विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में नहाय-खाय के दिन तोरई यानी झींगुली के पत्तों पर पूजा सामग्री अर्पित करने और नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी तथा पारंपरिक सात्विक व्यंजन खाने की प्राचीन परंपरा है। नहाय-खाय का मूल उद्देश्य अगले दिन के कठोर और निर्जला उपवास के लिए शरीर और मन को आध्यात्मिक तथा शारीरिक रूप से तैयार करना होता है।

3 अक्टूबर को मुख्य निर्जला व्रत और पूजा का शुभ मुहूर्त

नहाय-खाय के अगले दिन 3 अक्टूबर को व्रती महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दिन की शुरुआत करेंगी और दिनभर निर्जला उपवास का कठोर संकल्प निभाएंगी। पूरे दिन और रात पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है, जो माताओं के अपने बच्चों के प्रति अटूट प्रेम और त्याग को दर्शाता है। शाम के समय महिलाएं नए अथवा स्वच्छ वस्त्र धारण कर सामूहिक रूप से एकत्र होती हैं और पूजा पंडालों या घरों में पूजा संपन्न करती हैं।

पंचांग के अनुसार 3 अक्टूबर को पूजा का सबसे उत्तम समय प्रदोष काल में शाम 6 बजकर 05 मिनट से प्रारंभ होगा, जो रात्रि 8 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में पूजा-अर्चना करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसके अतिरिक्त दिन के सामान्य शुभ मुहूर्तों में सुबह 4 बजकर 38 मिनट से 5 बजकर 26 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त और दोपहर 11 बजकर 46 मिनट से 12 बजकर 34 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। व्रती महिलाएं प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन के समक्ष धूप, दीप, अगरबत्ती, फल, फूल और बांस के पत्तों की डलिया में प्रसाद अर्पित कर पूजा कर सकती हैं।

भगवान जीमूतवाहन की पूजा और जितिया व्रत कथा का महत्व

जीवित्पुत्रिका व्रत के केंद्र में राजा जीमूतवाहन की पूजा और उनकी कथा का श्रवण निहित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन अत्यंत धर्मात्मा, त्यागी और दयालु शासक थे। उन्होंने एक असहाय नाग माता के पुत्र शंखचूड़ के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं को पक्षीराज गरुड़ का ग्रास बनने के लिए अर्पित कर दिया था। जीमूतवाहन के इस अप्रतिम त्याग और परोपकार से प्रभावित होकर गरुड़ देव ने न केवल उनके प्राण लौटाए, बल्कि भविष्य में किसी भी सर्प का शिकार न करने का वचन दिया।

यही कारण है कि जितिया के दिन मिट्टी या गाय के गोबर से चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाकर और जीमूतवाहन का आह्वान कर उनकी कथा सुनी जाती है। मान्यता है कि जो माताएं पूर्ण निष्ठा से जीमूतवाहन का पूजन करती हैं और इस प्रेरक कथा का श्रवण करती हैं, उनके बच्चों के जीवन पर आने वाले समस्त संकट, रोग और अकाल मृत्यु के योग दूर हो जाते हैं।

4 अक्टूबर को पारण का समय और पारंपरिक नियम

कठिन निर्जला व्रत का विधिवत समापन 4 अक्टूबर 2026, रविवार को पारण के साथ होगा। पंचांग के अनुसार सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त हो जाएगी, जिसके पश्चात नवमी तिथि में पारण किया जा सकता है। विभिन्न स्थानीय पंचांगों के अनुसार पारण का सर्वोत्तम समय प्रातः 6 बजकर 15 मिनट से लेकर प्रातः 7 बजकर 28 मिनट के मध्य बताया गया है। व्रती महिलाओं को अपने स्थानीय सूर्योदय के अनुसार इस समय का पालन करना चाहिए।

पारण करने से पूर्व महिलाएं स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं और भगवान जीमूतवाहन को भोग अर्पित करती हैं। इसके बाद पारंपरिक रूप से नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी, चना और अन्य मौसमी सब्जियों का सात्विक प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। निर्जला रहने के बाद एकदम से गरिष्ठ या तला-भुना भोजन करने के बजाय सुपाच्य और हल्का भोजन करना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अनुकूल माना जाता है।

Jitiya Vrat 2026: लोक आस्था और अटूट मातृत्व का संगम

जितिया व्रत केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना और परिवार के प्रति मातृत्व के असीम समर्पण का पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल की तराई में इस पर्व को लेकर अप्रतिम उल्लास देखने को मिलता है। 2 अक्टूबर के नहाय-खाय से शुरू होकर 4 अक्टूबर के पारण तक चलने वाला यह त्रि-दिवसीय अनुष्ठान परिवार में एकता, धर्म और त्याग के मूल्यों को संजोए रखता है। स्थानीय पंचांग और रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए श्रद्धापूर्वक किया गया यह पूजन सभी संतानों को दीर्घायु और आरोग्य का आशीष प्रदान करता है।

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लेखक

Netsha Singh

नेत्शा सिंह डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी न्यूज़ कंटेंट राइटर हैं। वे सरकारी योजनाओं, आपका पैसा, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल न्यूज़ लेखन में उन्हें लगभग एक साल का अनुभव है; इससे पहले वे खबर नगरी और ऑनलाइन ताज़ा खबर के साथ काम कर चुकी हैं और यूट्यूब पर समसामयिक विषयों पर कंटेंट भी बनाती हैं।

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