राव ने जादूगोड़ा में बातचीत के दौरान बताया कि राज्य में निकाले जाने वाले यूरेनियम अयस्क की गुणवत्ता बहुत कम है। एक टन अयस्क से केवल 200 से 300 ग्राम यूरेनियम प्राप्त होता है, इसलिए स्वास्थ्य पर प्रभाव नगण्य माना जाता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न संगठनों द्वारा कम से कम दस वैज्ञानिक अध्ययन हो चुके हैं और इनमें खनन तथा क्षेत्र में दर्ज बीमारियों के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया। कंपनी का मत है कि विकिरण का स्तर समुद्र तटों पर मौजूद प्राकृतिक विकिरण से भी कम है।
Jharkhand News: UCIL झारखंड में किन खदानों से यूरेनियम निकालती है?
यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड झारखंड में सात यूरेनियम खदानों में काम करती है। इनमें बागजाता, जादूगोड़ा, भाटिन, नरवापहाड़ और तुरामडीह शामिल हैं। मोहुलडीह में छह भूमिगत खदानें संचालित हैं, जबकि बंदुहुड़ांग में एक खुली खदान है। देश की पहली भूमिगत यूरेनियम खदान 1964 में पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा में शुरू हुई थी। अयस्क प्रसंस्करण संयंत्र की शुरुआत 1968 में हुई। छह दशकों से अधिक समय से चल रही इन गतिविधियों पर कंपनी का कहना है कि प्रसंस्करण के बाद बची अधिकांश सामग्री अवशेष के रूप में रहती है, जिसकी रेडियोधर्मिता निर्धारित सीमा से नीचे है।
सामाजिक संगठन खनन को बीमारियों से क्यों जोड़ते रहे हैं?
स्थानीय समूह और सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता लंबे समय से UCIL की गतिविधियों की आलोचना करते आए हैं। उनका आरोप है कि खदानों और मिलों से निकलने वाला विकिरण आसपास के गांवों को प्रभावित कर रहा है तथा कैंसर, टीबी और जन्मजात विकृतियों की घटनाएं बढ़ा रहा है। ये संगठन मांग करते रहे हैं कि स्वतंत्र स्वास्थ्य सर्वेक्षण कराया जाए और प्रभावित परिवारों को मुआवजा तथा इलाज की व्यवस्था दी जाए। UCIL इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है और कहती है कि बीमारियों का मुख्य कारण क्षेत्र का पिछड़ापन, साफ-सफाई की कमी और अन्य स्थानीय कारक हैं। कंपनी जागरूकता कार्यक्रम चलाकर खनन को लेकर फैली धारणाओं को दूर करने का दावा भी कर रही है।
खदान में काम करने वाले कर्मचारियों का अनुभव क्या कहता है?
नरवापहाड़ में शिफ्ट इंचार्ज के रूप में कार्यरत 47 वर्षीय साई प्रसाद ने बताया कि वे पिछले 18 वर्षों से खदान में हैं और न तो उन्हें न ही उनके परिवार को विकिरण से जुड़ी कोई बीमारी हुई है। उनके अनुसार खदान में 700 से अधिक लोग काम करते हैं और इनमें से कई दो दशक से अधिक समय से ड्यूटी पर हैं। सीधे खनन कार्यों में लगे रहने के बावजूद उन्हें इस तरह का स्वास्थ्य प्रभाव महसूस नहीं हुआ। कंपनी इस तरह के बयानों को अपने दावे के समर्थन में रखती है कि कार्यस्थल पर विकिरण नियंत्रण में है। हालांकि बाहरी संगठन कर्मचारियों के बयान और आसपास के गांवों की स्थिति को अलग-अलग मानते हैं।
BARC के अध्ययन में विकिरण स्तर को कितना सुरक्षित बताया गया?
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की पर्यावरण सर्वेक्षण प्रयोगशाला से जुड़ी स्वास्थ्य भौतिकी इकाई के प्रभारी डॉ. एन. के. शेट्टी ने कहा कि अध्ययनों में यूरेनियम खदानों की विकिरण स्थिति सुरक्षित पाई गई है। कर्मचारियों के विकिरण संपर्क की मात्रा सालाना 20 मिलीसीवर्ट की निर्धारित सीमा से काफी कम रही। उन्होंने यह भी कहा कि छह दशकों से जारी खनन का पर्यावरण पर प्रभाव नगण्य है। UCIL का तर्क है कि अयस्क की कम ग्रेड और प्रसंस्करण के बाद बचे अवशेष की कम रेडियोधर्मिता के कारण बाहरी आबादी पर असर नहीं पड़ता। कंपनी निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करने और नियमित निगरानी का दावा करती है।
स्थानीय लोगों और कंपनी के बीच विवाद आगे कैसे देखा जा रहा है?
एक ओर कंपनी वैज्ञानिक अध्ययनों और कर्मचारियों के अनुभव का हवाला देकर खनन को सुरक्षित बता रही है, वहीं सामाजिक संगठन स्वतंत्र और लंबे समय तक चलने वाले स्वास्थ्य सर्वेक्षण की मांग पर अड़े हैं। जादूगोड़ा और आसपास के इलाके में पीने के पानी, टेलिंग बांध और अवशेष प्रबंधन को लेकर सवाल पहले भी उठते रहे हैं। UCIL का कहना है कि जागरूकता अभियान से गलत सूचना कम होगी। स्थानीय निवासियों के लिए साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधा और नियमित जांच की व्यवस्था विवाद को कम करने में सहायक मानी जाती है। फिलहाल आधिकारिक रुख यही है कि यूरेनियम निष्कर्षण और कैंसर या जन्मजात विकृतियों के बीच कोई स्थापित संबंध नहीं है।
काचम आनंद राव के बयान और BARC इकाई के आकलन के अनुसार झारखंड की इन खदानों से निकलने वाला विकिरण निर्धारित सीमा के अंदर है तथा बीमारियों का कारण खनन नहीं बताया गया है। सामाजिक संगठनों के पुराने आरोप अभी भी सार्वजनिक चर्चा में बने हुए हैं। दोनों पक्षों के दावों को परखने के लिए स्वतंत्र आंकड़े और निरंतर स्वास्थ्य निगरानी अहम रहेंगे।
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