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Durva Ashtami 2026: 18 सितंबर को है दूर्वा अष्टमी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और दूर्वा की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

Durva Ashtami 2026: 18 सितंबर को है दूर्वा अष्टमी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और दूर्वा की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

सारांश

  • Durva Ashtami 2026: सनातन हिंदू धर्म परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है।
  • पंचांग के अनुसार 18 सितंबर को दोपहर 1:02 बजे से लेकर सायंकाल 6:14 बजे तक का समय दूर्वा पूजन और गणेश वंदना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।
  • दूर्वा की अलौकिक उत्पत्ति को लेकर भविष्य पुराण और विष्णु पुराण में एक अत्यंत रोचक एवं पावन कथा वर्णित है।
  • कथा के अनुसार देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी और समस्त देवियों ने भी अपने सुहाग और संतानों की रक्षा के लिए इस व्रत का पालन किया था।

Durva Ashtami 2026: सनातन हिंदू धर्म परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अत्यंत पावन और फलदायी माना गया है। इसी शुभ तिथि पर प्रकृति, पवित्रता और अमरता के प्रतीक पर्व ‘दूर्वा अष्टमी’ का अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक किया जाता है। वर्ष 2026 में दूर्वा अष्टमी का यह पावन व्रत 18 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की आराधना के साथ-साथ दूर्वा यानी हरी दूब घास का विधि-विधान से पूजन करने की प्राचीन परंपरा है। वैदिक मान्यताओं में दूर्वा को केवल एक साधारण वनस्पति नहीं, बल्कि साक्षात अमृत तत्व और भगवान श्रीहरि विष्णु के तेज का अंश माना गया है।

दूर्वा घास की सबसे बड़ी विशेषता उसका निरंतर पल्लवित होना और विपरीत परिस्थितियों में भी कभी नष्ट न होना है। इसी प्राकृतिक गुण के आधार पर हिंदू परिवारों में दूर्वा अष्टमी का पूजन वंश वृद्धि, अखंड सौभाग्य, पारिवारिक समृद्धि और संतान के दीर्घायु जीवन की मंगलकामना से किया जाता है। पौराणिक ग्रंथों में इस दिन का संबंध समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पांडुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को दिए गए आध्यात्मिक उपदेशों से भी जोड़ा गया है, जो इस व्रत के महत्व को और अधिक बढ़ा देता है।

Durva Ashtami 2026: 18 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, जानें तिथि और शुभ मुहूर्त का समय

वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 18 सितंबर, शुक्रवार को दोपहर लगभग 1:02 बजे से हो रहा है। यह पावन तिथि अगले दिन यानी 19 सितंबर 2026 को दोपहर करीब 3:26 बजे तक प्रभावी रहेगी। चूंकि धर्मशास्त्रों में दूर्वा अष्टमी का पूजन मध्याह्न और अपराह्न काल की पूर्वविद्धा अष्टमी में किए जाने का विधान बताया गया है, इसलिए 18 सितंबर को ही यह व्रत और पूजन संपन्न किया जाएगा।

पंचांग के अनुसार 18 सितंबर को दोपहर 1:02 बजे से लेकर सायंकाल 6:14 बजे तक का समय दूर्वा पूजन और गणेश वंदना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। इस दिन पूर्वार्ध में ज्येष्ठा नक्षत्र और उत्तरार्ध में मूल नक्षत्र का संयोग रहेगा। इसके साथ ही प्रीति और आयुष्मान योग का दुर्लभ मेल इस दिन की धार्मिक ऊर्जा को और अधिक प्रबल बना रहा है। देश के विभिन्न शहरों में स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के आधार पर पूजन मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर देखने को मिल सकता है, अतः श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार निश्चित समय तय कर सकते हैं।

दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व: विघ्नहर्ता गणेश और दूर्वा का गहरा संबंध

भगवान श्रीगणेश की किसी भी पूजा में दूर्वा का स्थान सर्वोपरि माना जाता है और दूर्वा के बिना गणपति की आराधना अधूरी मानी जाती है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब प्रथम पूज्य गणेश जी ने अनलासुर नामक दैत्य को निगल लिया था, तब उनके उदर में भीषण दाह और अग्नि प्रज्वलित हो उठी थी। उस समय समस्त देवी-देवताओं के उपचार विफल हो गए, तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा के इक्कीस तिनकों का पुंज बनाकर गणपति को अर्पित किया, जिससे उनके शरीर की जलन तत्काल शांत हो गई। इसी कारण भगवान गणेश को दूर्वा अतिशय प्रिय है।

दूर्वा अष्टमी के पावन अवसर पर दूर्वा अर्पित करने से जीवन के समस्त विघ्न-बाधाएं, ग्रह दोष और अज्ञात भय दूर हो जाते हैं। दूर्वा को शीतलता, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा का संवाहक माना जाता है। इस दिन जो भी श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा और शुचिता के साथ दूर्वा से भगवान गणेश का अर्चन करते हैं, उनके घर-परिवार में मानसिक शांति का वास होता है और सभी प्रकार के पारिवारिक तनावों का निवारण होता है।

समुद्र मंथन और अमृत कलश: कैसे हुई पावन दूर्वा की उत्पत्ति

दूर्वा की अलौकिक उत्पत्ति को लेकर भविष्य पुराण और विष्णु पुराण में एक अत्यंत रोचक एवं पावन कथा वर्णित है। पौराणिक वृत्तांत के अनुसार सतयुग में जब देवताओं और दैत्यों ने अमृत प्राप्ति के उद्देश्य से क्षीरसागर का मंथन किया था, तब मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को नेती बनाया गया था। पर्वत के भारी वजन से संतुलन बनाए रखने के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने विशाल कच्छप (कूर्म) अवतार धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर स्थापित किया था।

मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत तीव्र गति से घूमा, तो पर्वत के घर्षण से भगवान विष्णु के शरीर के कुछ रोम उखड़कर समुद्र के जल में गिर गए। समुद्र की पावन लहरों ने उन दिव्य रोमों को किनारे पर प्रवाहित कर दिया, जो पृथ्वी की गोद में जाकर हरी-भरी दूर्वा के रूप में अंकुरित हो गए। इसके उपरांत जब समुद्र से धन्वंतरि देव अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो उस अमृत कलश को देवताओं ने इसी दूर्वा के आसन पर स्थापित किया था। कलश रखते समय अमृत की कुछ पावन बूंदें दूर्वा पर छलक गईं, जिसके प्रभाव से दूर्वा सर्वदा के लिए अमर और परम पवित्र हो गई।

भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर संवाद: वंश वृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद

महाभारत काल में जब पांडव वनवास के दौरान संकटों से जूझ रहे थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ऐसे व्रत के बारे में पूछा जिससे कुल की कीर्ति, अखंड सौभाग्य और संतानों की रक्षा हो सके। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें दूर्वा अष्टमी के व्रत और पूजन का महात्म्य विस्तार से सुनाया था। श्रीकृष्ण ने बताया कि जिस प्रकार दूर्वा की जड़ें जमीन में गहरी धंसी रहती हैं और उसकी शाखाएं चारों दिशाओं में अनवरत फैलती जाती हैं, उसी प्रकार जो स्त्री या पुरुष दूर्वा अष्टमी का पूजन करता है, उसका वंश और कुल दूर्वा की भांति निरंतर फलता-फूलता रहता है।

कथा के अनुसार देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी और समस्त देवियों ने भी अपने सुहाग और संतानों की रक्षा के लिए इस व्रत का पालन किया था। यही कारण है कि भारतीय समाज में विशेष रूप से माताएं अपने पुत्र-पुत्रियों के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और संकटों से मुक्ति की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं। यह पर्व प्रकृति के प्रति मानवीय कृतज्ञता और जीवन की अटूट निरंतरता का दिव्य प्रतीक है।

दूर्वा अष्टमी की प्रामाणिक पूजा विधि और आवश्यक पूजन सामग्री

दूर्वा अष्टमी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर दैनिक नित्यकर्मों से निवृत्त होकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक पाटे पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीगणेश, मां पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा के लिए किसी स्वच्छ और पवित्र स्थान से ताजी दूर्वा तोड़कर लाएं, जिसे धोकर स्वच्छ कर लें।

दूर्वा के 21-21 तिनकों के जोड़े बनाकर उन्हें मौली से बांध लें। भगवान गणेश को सिंदूर, रोली, अक्षत, चंदन, जनेऊ, मौसमी फल और मोदक या लड्डू का नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करते हुए दूर्वा के पुंज को भगवान गणेश के चरणों और मस्तक पर समर्पित करें। दूर्वा का भी अलग से गंध, अक्षत और पुष्प से पंचोपचार पूजन करें। पूजा के अंत में दूर्वा अष्टमी की पावन व्रत कथा का श्रवण करें, कर्पूर जलाकर आरती करें और उपस्थित परिजनों में प्रसाद का वितरण करें। इस दिन जरूरतमंदों को सप्तधान्य, वस्त्र अथवा फल का दान करना विशेष फलदायी माना जाता है।

Durva Ashtami 2026: निष्कर्ष

दूर्वा अष्टमी 2026 का यह पावन पर्व सनातन संस्कृति के उस गहरे दर्शन को उजागर करता है जिसमें प्रकृति के एक अत्यंत सुलभ और विनम्र घटक यानी हरी घास को भी देवतुल्य सम्मान दिया गया है। समुद्र मंथन के अमृत से अभिसिंचित दूर्वा का पूजन हमें यह प्रेरणा देता है कि जीवन में कितनी भी प्रतिकूलताएं आएं, हमें दूर्वा की भांति अपनी जड़ों से जुड़े रहकर निरंतर विकास और सरलता का मार्ग चुनना चाहिए। 18 सितंबर को भगवान गणेश और दूर्वा की सच्चे मन से की गई आराधना न केवल साधक के जीवन के समस्त संकटों को हरने वाली सिद्ध होगी, बल्कि पूरे परिवार में आरोग्य, शांति और वंश वृद्धि का अक्षय वरदान भी प्रदान करेगी।

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लेखक

Netsha Singh

नेत्शा सिंह डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी न्यूज़ कंटेंट राइटर हैं। वे सरकारी योजनाओं, आपका पैसा, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल न्यूज़ लेखन में उन्हें लगभग एक साल का अनुभव है; इससे पहले वे खबर नगरी और ऑनलाइन ताज़ा खबर के साथ काम कर चुकी हैं और यूट्यूब पर समसामयिक विषयों पर कंटेंट भी बनाती हैं।

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