Behat Assembly Election Result 2027: सहारनपुर जिले की बेहट विधानसभा सीट कागजों पर समाजवादी पार्टी के लिए सुरक्षित नजर आती है। करीब 3 लाख 75 हजार वोटरों वाली इस सीट पर मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका निभाती है। पिछले चार चुनावों में सपा या उसके गठबंधन ने यहां बढ़त बनाए रखी है। फिर भी जमीनी हकीकत इतनी सरल नहीं है। सपा का स्वतंत्र संगठन कमजोर माना जाता है।

मसूद परिवार के प्रभाव और विरोधी ध्रुवीकरण ने पिछली जीतें दिलाई हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन का टिकट बंटवारा, विधायक पर स्थानीय नाराजगी और बसपा का संभावित कटाव समीकरण बदल सकता है। गैर-मुस्लिम ओबीसी और सवर्ण वोट भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए सीट अब आसान नहीं रह गई है।

Behat Assembly Election Result 2027: बेहट का जातिगत समीकरण क्या कहता है?

बेहट में मुस्लिम वोटर करीब 38 से 40 प्रतिशत हैं। ये वोट पिछले चुनावों में सपा गठबंधन की ओर एकतरफा झुके हैं। दलित वोटरों में जाटव बहुमत है और इनकी हिस्सेदारी 22 से 24 प्रतिशत बताई जाती है। ओबीसी वर्ग में सैनी, कश्यप और गुर्जर शामिल हैं। इनकी संख्या भी 22 से 24 प्रतिशत के आसपास है। सवर्ण और अन्य जातियों में ठाकुर व ब्राह्मण करीब 14 से 16 प्रतिशत हैं। यह मिश्रण सीट को संवेदनशील बनाता है।

2017 और 2019 के नतीजों से क्या संकेत मिले?

2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन से नरेश सैनी ने करीब 97 हजार वोट पाकर जीत दर्ज की। बसपा और भाजपा दोनों करीब 71 हजार वोटों पर सिमट गईं। 2019 लोकसभा में बेहट सेगमेंट से सपा-बसपा गठबंधन के हाजी फजलुर्रहमान को एक लाख दो हजार से अधिक वोट मिले। भाजपा पर करीब 11 हजार 400 वोटों की बढ़त बनी। ये आंकड़े गठबंधन की ताकत दिखाते हैं।

Behat Assembly Election Result 2027: 2022 विधानसभा चुनाव में अंतर कैसे बढ़ा?

2022 में सपा के उमर अली खान ने एक लाख 34 हजार 500 वोट हासिल किए। जीत का अंतर करीब 37 हजार 800 वोट रहा। भाजपा के नरेश सैनी 96 हजार 600 वोटों पर रह गए। इस बार अंतर पहले से काफी बढ़ा हुआ था। मुस्लिम वोट के साथ दलित वर्ग के कुछ हिस्से का झुकाव भी दिखा। स्थानीय प्रभाव और विरोधी ध्रुवीकरण ने नतीजा तय किया।

2024 लोकसभा सेगमेंट का रुझान

2024 लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन से इमरान मसूद को अकेले बेहट सेगमेंट में एक लाख 33 हजार से ज्यादा वोट मिले। भाजपा पर करीब 38 हजार 200 वोटों की बढ़त दर्ज हुई। संविधान के मुद्दे पर जाटव वोटरों का गठबंधन की ओर झुकाव देखा गया। यह रुझान सपा खेमे के लिए सकारात्मक रहा। फिर भी सीट पर स्थायी संगठन की कमी बनी हुई है।

Behat Assembly Election Result 2027: सपा की ताकत कहां टिकी है?

सपा की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम वोट का भारी एकजुट होना है। 85 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम वोटर गठबंधन के साथ रहे हैं। 2024 में दलित वोट का कुछ हिस्सा भी उसी दिशा में गया। मसूद परिवार का स्थानीय रसूख पिछले चुनावों में निर्णायक रहा। एंटी-बीजेपी माहौल ने भी अंतर बढ़ाया। ये कारक कागजों पर सपा को आगे रखते हैं।

संगठन की कमजोरी क्या परेशानी पैदा कर रही है?

बेहट में सपा का अपना स्वतंत्र कैडर अपेक्षाकृत कमजोर माना जाता है। 2022 की जीत मुख्य रूप से मसूद परिवार के प्रभाव और ध्रुवीकरण से आई। पार्टी संगठन की जड़ें उतनी गहरी नहीं दिखतीं। स्थानीय कार्यकर्ताओं में विधायक उमर अली खान से नाराजगी की चर्चाएं हैं। अगर यह नाराजगी बढ़ी तो भाजपा इसे भुनाने की कोशिश करेगी।

Behat Assembly Election Result 2027: गैर-मुस्लिम ओबीसी और सवर्ण वोट कहां हैं?

सैनी, कश्यप और ठाकुर वोटरों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ लामबंद रहता है। ये वर्ग एकतरफा रुझान दिखाते हैं। सवर्ण वोटर भी भाजपा की ओर झुके हुए हैं। सपा को इन वर्गों में पैठ बनानी होगी। सिर्फ मुस्लिम वोट पर निर्भरता लंबे समय तक पर्याप्त नहीं रहेगी। अति-पिछड़े वर्गों तक पहुंचना जरूरी हो गया है।

2027 में गठबंधन और टिकट का सवाल

अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन जारी रहता है तो सीट बंटवारे पर विवाद से बचना होगा। मौजूदा विधायक सपा से हैं जबकि सांसद कांग्रेस से हैं। इमरान मसूद और टिकट को लेकर सिरफुटौव्वल नुकसानदेह साबित हो सकता है। साफ समझौता न होने पर वोट बंट सकते हैं। स्थानीय समीकरण इसे और पेचीदा बनाते हैं।

Behat Assembly Election Result 2027: बसपा का संभावित कटाव कितना असर डालेगा?

बसपा अगर मजबूत मुस्लिम चेहरा उतारती है तो 35 हजार से 40 हजार वोट काट सकती है। ऐसा हुआ तो सपा सीधे दबाव में आ जाएगी। दलित वोट का एक हिस्सा बसपा की ओर भी जा सकता है। इसलिए सपा को अति-पिछड़े कश्यप और सैनी वर्ग में काम करना होगा। केवल पारंपरिक वोट बैंक पर टिके रहना जोखिम भरा होगा।

बेहट विधानसभा सीट 2027 में सपा या इंडिया गठबंधन के पक्ष में झुकी दिखती है। अनुमानित वोट शेयर सपा गठबंधन के लिए 44 से 46 प्रतिशत, भाजपा के लिए 38 से 40 प्रतिशत और बसपा के लिए 10 से 12 प्रतिशत बताया जा रहा है। मुस्लिम एकजुटता और पिछले रुझान सपा को बढ़त देते हैं।

फिर भी संगठन की कमजोरी, विधायक पर नाराजगी, गठबंधन का टिकट विवाद और बसपा का संभावित दखल सीट को प्रतिस्पर्धी बनाए रखेंगे। गैर-मुस्लिम ओबीसी वर्ग में पैठ न बढ़ी तो अंतर घट सकता है। जमीनी काम और साफ समीकरण ही अंतिम नतीजा तय करेंगे।

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