Puri Jagannath Janmashtami Rituals: जन्माष्टमी की धूम से ठीक एक शाम पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर में एक विशेष सेवा होती है। पुजारी बृजमोहन पंडित ने एनडीटीवी इंडिया को बताया कि इस अनुष्ठान को गर्भोदक बंदापना नीति कहते हैं। मान्यता है कि महाप्रभु जगन्नाथ माता का भाव धारण कर अपने गर्भ में श्रीकृष्ण को रखते हैं।

संध्या धूप आरती के बाद वातावरण बदल जाता है। गर्भ रक्षा की वंदना होती है। उसके तुरंत बाद गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं ताकि एकांत बना रहे। इस समय प्रभु को माता देवकी के भाव में माना जाता है। कपाट बंद होने के बाद जेऊठ भोग लगाया जाता है।

यह भोग मंदिर रसोई में औषधीय सब्जियों और जड़ी बूटियों से बनता है। परंपरा कहती है कि ऐसा आहार प्रसव पीड़ा में राहत के लिए दिया जाता रहा है। अष्टमी की मध्यरात्रि पर नीति पूर्ण मानी जाती है। फिर नाल छेदन का संस्कार होता है। अगले दिन मंदिर में कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है।

Puri Jagannath Janmashtami Rituals: जगन्नाथ को अवतारी क्यों कहा जाता है

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार जगन्नाथ केवल एक अवतार नहीं, अवतारी यानी मूल स्रोत माने जाते हैं। स्कंद पुराण और वामदेव संहिता का हवाला दिया गया है कि द्वापर में श्रीकृष्ण और त्रेता में श्रीराम पुरी दर्शन को आए। पालनहार के जन्म की लीला में माता भाव स्वयं महाप्रभु में माना गया।

संध्या धूप के बाद क्या बदलता है

आरती पूरी होते ही सेवायत विशेष आरती करते हैं। गर्भ रक्षा और कृष्ण के सुरक्षित प्राकट्य की वंदना को गर्भोदक बंदापना कहा गया। इसके बाद कपाट बंद रहते हैं। भीड़ और सामान्य दर्शन इस एकांत के बीच नहीं चलते। समय संध्या से रात तक बंधा है।

Puri Jagannath Janmashtami Rituals: जेऊठ भोग क्यों लगाया जाता है

कपाट बंद होने के बाद विशेष आयुर्वेदिक भोग चढ़ता है। रसोई में जड़ी बूटी और औषधीय सब्जियां इस्तेमाल होती हैं। मान्यता है कि गर्भवती स्त्री को संबल देने वाला यही आहार सदियों से चलता आया। सामग्री की पूरी सूची इस विवरण में नहीं दी गई।

मध्यरात्रि का नाल छेदन

अष्टमी की मध्यरात्रि को गर्भधारण नीति पूर्ण बताई गई। उसके बाद बाल गोपाल की गर्भनाल काटने का संस्कार होता है। पुरी की कहावत है आज माता, कल पुत्र, परसों फिर माता। लीला का चक्र इसी पंक्ति में समेटा गया है।

Puri Jagannath Janmashtami Rituals: जन्माष्टमी की रात मंदिर में क्या होता है

रात भर मातृत्व भाव की सेवा के बाद अगले दिन यानी जन्माष्टमी की पावन रात श्रीमंदिर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूम से मनाया जाता है। जो जगन्नाथ हैं वही माता बनकर बाल गोपाल को प्रकट करते माने जाते हैं। बाहर की झांकियां मंदिर की इस आंतरिक नीति से अलग समय पर चलती हैं।

सामान्य भक्त इस सेवा को कैसे समझें

कपाट बंद रहने के कारण यह अनुष्ठान गर्भगृह के अंदर सीमित रहता है। दर्शन का सामान्य क्रम उस घड़ी नहीं खुलता। भक्त मान्यता और पुजारी के वर्णन से ही जान पाते हैं। फोटो या सीधा प्रसारण इस रिपोर्ट में नहीं बताया गया।

माता पिता दोनों तत्व वाली मान्यता

प्रश्न उठाया गया कि पालनहार के जन्म पर माता कौन बने। उत्तर परंपरा में यह है कि महाप्रभु में दोनों तत्व समाहित हैं। इसलिए एक शाम वे स्वयं माता भाव में सेवा ग्रहण करते हैं। यह आस्था का पक्ष है, ऐतिहासिक प्रयोग नहीं।

Puri Jagannath Janmashtami Rituals: जेऊठ भोग और रोज के महाप्रसाद में फर्क

रोज का भोग और यह विशेष थाली अलग मानी गई। जेऊठ भोग केवल इस नीति से जुड़ा बताया गया। सामान्य महाप्रसाद की पंक्ति उस रात की इस थाली से मिलाकर न देखें। रसोई परंपरा मंदिर के अपने नियम से चलती है।

पुरी श्रीमंदिर में जन्माष्टमी से एक शाम पहले गर्भोदक बंदापना नीति होती है। संध्या धूप के बाद वंदना, कपाट बंद और जेऊठ भोग क्रम है। मध्यरात्रि पर नाल छेदन और अगले दिन जन्मोत्सव बताया गया। पुजारी बृजमोहन पंडित के वर्णन और शास्त्रीय मान्यता पर यह विवरण टिका है। भक्त आस्था से इसे पढ़ें। मंदिर की अगली आधिकारिक सेवा सूची से समय की पुष्टि कर सकते हैं।

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