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Parenting Tips: अक्सर देखा जाता है कि बच्चे दिनभर स्कूल में समय बिताने के बाद जब घर लौटते हैं, तो माता-पिता उनके दिनभर के अनुभवों को जानने के लिए बेहद उत्सुक रहते हैं। स्कूल में क्या हुआ, दोस्तों के साथ कैसा व्यवहार रहा, शिक्षकों ने क्या पढ़ाया या लंच ब्रेक में क्या गतिविधियां हुईं, ये तमाम सवाल अभिभावकों के मन में घूमते रहते हैं। लेकिन जब माता-पिता सामान्य रूप से पूछते हैं कि आज का दिन कैसा रहा, तो अधिकांश बच्चों का एक ही जवाब होता है कि दिन अच्छा था। इसके बाद बातचीत वहीं थम जाती है और अभिभावक चाहकर भी बच्चों के मन की बात नहीं जान पाते। व्यवहार विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों पर सवालों की बौछार करने के बजाय बातचीत का तरीका बदलने से वे खुद खुलकर अपनी भावनाएं साझा करने लगते हैं।

बच्चों के साथ एक सहज और पारदर्शी रिश्ता बनाना हर माता-पिता का सपना होता है। वर्तमान दौर में परवरिश के तरीके में काफी बदलाव आया है, जहां सख्त अनुशासन की जगह समझदारी और दोस्ताना व्यवहार को प्राथमिकता दी जा रही है। व्यवहार विश्लेषक और शिक्षाविदों का कहना है कि अगर बच्चों के साथ बातचीत को सहज बनाया जाए, तो वे बिना किसी डर या हिचकिचाहट के अपने मन की बात कह सकते हैं। इसके लिए अभिभावकों को कुछ खास पेरेंटिंग ट्रिक्स अपनाने की आवश्यकता होती है, जो बच्चों के मानसिक स्तर को समझते हुए उनके साथ एक मजबूत और विश्वासी रिश्ता बनाने में मदद करती हैं।

Parenting Tips: घर लौटते ही सवालों की जगह प्यार और आत्मीयता से करें स्वागत

स्कूल से लौटने के बाद बच्चे अक्सर मानसिक और शारीरिक रूप से थकान महसूस करते हैं। लगभग सात से आठ घंटे पढ़ाई, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों में बिताने के बाद उन्हें तुरंत पूछताछ जैसा माहौल अच्छा नहीं लगता। ऐसी स्थिति में घर पहुंचते ही उनसे सवालों की झड़ी लगाने के बजाय प्रेमपूर्ण माहौल देना चाहिए। जब बच्चा घर आए तो सकारात्मक और स्नेहपूर्ण शब्दों से उसका स्वागत करना अधिक फायदेमंद साबित होता है।

अभिभावक बच्चों को यह अहसास करा सकते हैं कि वे उनके आने से कितने खुश हैं और दिनभर उनका ख्याल उनके मन में था। इस प्रकार की बातचीत में कोई सवाल या जवाब देने का दबाव नहीं होता। इससे बच्चे को यह भरोसा होता है कि घर एक सुरक्षित और तनावमुक्त स्थान है। जब बच्चे को अपने घर में बिना किसी शर्त के स्वीकार्यता और स्नेह मिलता है, तो वह मानसिक रूप से शांत महसूस करता है और अपने अनुभव साझा करने के लिए खुद ब खुद तैयार होता है।

बच्चों की पसंदीदा गतिविधियों में बिना सवाल किए 10 मिनट बिताएं

दिनभर की व्यस्तता के बाद बच्चों को अपनी दिनचर्या में ढलने और आराम करने के लिए कुछ समय की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में उनसे सीधे पढ़ाई या स्कूल से जुड़े प्रश्न पूछने के बजाय, वे जो कर रहे हों उसी में शामिल होना एक प्रभावी तरीका है। यदि बच्चा घर आकर चित्रकारी कर रहा है, कोई खेल खेल रहा है या सिर्फ संगीत सुन रहा है, तो माता-पिता को बिना किसी शर्त या सवाल के उसके पास बैठना चाहिए।

दिन में केवल दस मिनट का यह समय बच्चों के साथ जुड़ाव बढ़ाने में चमत्कारिक रूप से काम करता है। इस दौरान अभिभावकों को कोई सलाह देने या सवाल पूछने से बचना चाहिए। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता उसकी पसंद की चीजों में रुचि ले रहे हैं और उसकी व्यक्तिगत जगह का सम्मान कर रहे हैं, तो उसके मन से झिझक खत्म होती है। यह आत्मीयता धीरे-धीरे बातचीत के नए रास्ते खोलती है।

Parenting Tips: बातचीत की शुरुआत खुद से करें और मजेदार खेल का सहारा लें

बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए प्रेरित करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि माता-पिता पहले अपने दिन के अनुभव साझा करें। भोजन के समय या शाम के फुर्सत के क्षणों में अभिभावक अपने दिन की कोई छोटी, रोचक या सामान्य बात बच्चों को बता सकते हैं। जब बड़े अपने अनुभवों के बारे में बात करते हैं, तो बच्चों को भी अपनी बात कहने का प्रोत्साहन मिलता है।

इसके साथ ही परिवार में कुछ रचनात्मक गतिविधियों या खेलों को शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, दिन की सबसे अच्छी बात, भविष्य की किसी योजना या दिन की किसी चुनौती के बारे में बारी-बारी से बात की जा सकती है। इस तरह के खेल बच्चों को बिना किसी दबाव के अपनी खुशी, उम्मीद और परेशानियों को व्यक्त करने का अवसर देते हैं। इससे पूरा परिवार एक-दूसरे के करीब आता है और संवाद सहज बनता है।

केवल हां या ना वाले प्रश्नों के बजाय विचारशील सवाल पूछें

बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए प्रश्नों का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है। अक्सर माता-पिता ऐसे प्रश्न पूछते हैं जिनका उत्तर बच्चा केवल एक शब्द में दे सकता है। इसकी जगह ऐसे खुले प्रश्न पूछे जाने चाहिए जो बच्चे को सोचने और विस्तार से बताने का मौका दें। उदाहरण के लिए, यह पूछने के बजाय कि क्या आज पढ़ाई अच्छी हुई, यह पूछा जा सकता है कि आज किस बात पर सबसे ज्यादा हंसी आई या लंच ब्रेक में क्या नया हुआ।

जब बच्चा इन प्रश्नों का उत्तर देना शुरू करे, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे पूरे ध्यान से सुना जाए। उसकी बात के बीच में टोकना, तुरंत सुधार करना या बिना मांगे सलाह देना बातचीत के प्रवाह को रोक सकता है। जब बच्चों को यह विश्वास हो जाता है कि उनकी बात को गंभीरता से और बिना किसी पूर्वाग्रह के सुना जा रहा है, तो वे भविष्य में भी अपनी हर छोटी-बड़ी बात साझा करने में संकोच नहीं करते।

Parenting Tips: जब बच्चा शांत रहना चाहे तो उसकी इच्छा और निजता का सम्मान करें

परवरिश के दौरान यह समझना बेहद जरूरी है कि हर दिन बच्चे का मूड एक जैसा नहीं हो सकता। कभी-कभी थकावट, तनाव या किसी अन्य कारण से बच्चा तुरंत बात नहीं करना चाहता। ऐसी स्थिति में उस पर दबाव डालना या जबरदस्ती जवाब मांगने की कोशिश करना रिश्ते में दूरी पैदा कर सकता है। अगर बच्चा कहे कि वह अभी बात करने के मूड में नहीं है, तो उसकी इस भावना का सम्मान किया जाना चाहिए।

ऐसे समय में स्थिति को सहजता से स्वीकार करते हुए बच्चे को उसका व्यक्तिगत समय देना चाहिए। अभिभावकों को न तो नाराज होना चाहिए और न ही इसे व्यक्तिगत रूप से लेना चाहिए। जब बच्चे को यह अहसास होता है कि उसकी सीमाओं और इच्छाओं का सम्मान किया जा रहा है, तो उसका अपने माता-पिता पर भरोसा और गहरा होता है। बाद में जब वह मानसिक रूप से तैयार होता है, तो वह खुद आकर अपनी बातें साझा करता है।

बच्चों के साथ दोस्ताना और विश्वासपूर्ण रिश्ता बनाना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें धैर्य और सही दृष्टिकोण की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। जब माता-पिता बच्चों पर बेवजह का दबाव बनाने के बजाय उनकी भावनाओं, थकावट और निजता का सम्मान करते हैं, तो घर का माहौल अपने आप पारदर्शी और सुखद बन जाता है। स्नेहमयी शुरुआत, ध्यानपूर्वक सुनने की आदत और रचनात्मक संचार के जरिए किसी भी उम्र के बच्चे के साथ संवादहीनता को दूर किया जा सकता है। इन छोटी-छोटी बातों को दैनिक जीवन में अपनाकर न केवल बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाया जा सकता है, बल्कि माता-पिता और बच्चों के बीच एक ऐसा अटूट रिश्ता कायम किया जा सकता है जो ताउम्र कायम रहता है।

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