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Bihar Jharkhand News: दिल्ली बैठक में सोन जल बंटवारा तय, बिहार-झारखंड विवाद पर सहमति की घोषणा

Bihar Jharkhand News: दिल्ली बैठक में सोन जल बंटवारा तय, बिहार-झारखंड विवाद पर सहमति की घोषणा
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सारांश

  • Bihar Jharkhand News: सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड की खींच लंबे समय से फाइलों में दबी रही।
  • सम्राट चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री का धन्यवाद किया।
  • मामला कुछ इस तरह से है कि एमएएफ कागज की इकाई है, खेत बूंद मांगता है।
  • हस्ताक्षर, आधिकारिक विज्ञप्ति और संयुक्त निगरानी। पानी मापने वाले स्टेशन कौन चलाएगा, विवाद होने पर फैसला कौन सुनेगा—ये सवाल दस्तावेज में होने चाहिए।

Bihar Jharkhand News: सोन नदी के पानी को लेकर बिहार और झारखंड की खींच लंबे समय से फाइलों में दबी रही। सोमवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली बैठक में सहमति बन गई। उन्होंने इसे ऐतिहासिक समाधान कहा और किसानों के हित से जोड़ा।

झारखंड राज्य बनने के बाद से हिस्सा कितना-किसका, यह सवाल अधर में था। बैठक में जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शामिल होने की जानकारी दी गई। कागज पर सहमति आ गई तो नहर कब भरेगी, यह अब अमल पर टिका है।

Bihar Jharkhand News: विवाद इतना लंबा क्यों चला

नवंबर 2000 में झारखंड अलग हुआ। सोन गंगा की बड़ी सहायक है और मैदानी सिंचाई का पुराना सहारा रही। अविभाजित बिहार का हिस्सा दोनों राज्यों में बंटना था, फॉर्मूला अटक गया। परियोजनाएं और दावे एक-दूसरे से टकराते रहे।

केंद्र की ओर से जल शक्ति मंत्रालय और आंचलिक परिषद के मंच पहले भी इस्तेमाल हुए। तकनीकी समिति और केंद्रीय जल आयोग की चर्चा खबरों में आती रही। सोमवार की बैठक उसी सिलसिले का ऊपरी पड़ाव बताई जा रही है। 26 साल का आंकड़ा राजनीतिक भाषण में गूंजेगा, किसान पूछेगा पानी कब मिला।

बैठक और आभार का स्वर

सम्राट चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री का धन्यवाद किया। पोस्ट में लिखा गया कि लंबित मसला बिहार के हित में सुलझा। झारखंड की जनता को भी लाभ होने की बात उन्होंने कही। दो मुख्यमंत्रियों का एक मंच पर बैठना तस्वीर के लिए जरूरी था, दस्तावेज की भाषा और भी जरूरी है।

देखने पर लगता है कि केंद्र मध्यस्थ बना तो फाइल चली। बिना माप और निगरानी के समझौता बाद में फिर अदालत जा सकता है। इसलिए शर्तों की प्रति सार्वजनिक होना पहली कसौटी होगी।

बंटवारे का आंकड़ा क्या चर्चा में है

1973 के बानसागर समझौते में अविभाजित बिहार के हिस्से का जिक्र पुरानी फाइलों में है। उस कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट को अब दो हिस्सों में बांटने की रिपोर्टें हैं। बिहार के लिए 5.75 और झारखंड के लिए 2.0 मिलियन एकड़ फीट का आंकड़ा कई समाचारों में दोहराया गया।

यह रिपोर्टेड फॉर्मूला है, राजपत्र की अंतिम पंक्ति अभी अलग से देखनी होगी। झारखंड को निश्चित मात्रा का हक पहली बार औपचारिक रूप मिलना बताया जा रहा है। बिहार के लिए पुरानी व्यवस्था का नया अनुपात है। दोनों तरफ संतोष के साथ तुलना भी चलेगी।

मामला कुछ इस तरह से है कि एमएएफ कागज की इकाई है, खेत बूंद मांगता है। सूखे साल में आंकड़ा पूरा न उतरे तो विवाद की राख फिर गर्म हो सकती है।

सिंचाई वाले जिलों पर असर

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों को सिंचाई के लिए पानी ज्यादा उपलब्ध होगा। सोन नहर क्षेत्र भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, पटना, गया और अरवल जैसे इलाकों से जुड़ा रहा है। गर्मी में पंप और नहर दोनों पर निर्भर किसान इंतजार करते हैं।

इंद्रपुरी जलाशय जैसी योजनाएं विवाद की छाया में अटकने की चर्चा रही। सहमति कानूनी अड़चन हटा सकती है। भूमि, ठेका और बजट फिर अपनी पटरी पर चलेंगे। एक दिन की बैठक से धान नहीं पकता। फिर भी फाइल आगे खिसकना विकास की पहली सीढ़ी माना जाता है।

झारखंड पठार में सिंचाई और पेयजल दोनों एजेंडे हैं। निर्धारित हिस्सा मिलने से योजना बनाना सरल होगा, यही तर्क पटना के बाहर भी चलता रहा।

Bihar Jharkhand News: अमल की परीक्षा आगे है

हस्ताक्षर, आधिकारिक विज्ञप्ति और संयुक्त निगरानी। पानी मापने वाले स्टेशन कौन चलाएगा, विवाद होने पर फैसला कौन सुनेगा—ये सवाल दस्तावेज में होने चाहिए। किसान संगठनों को समय-सारिणी चाहिए, प्रेस वक्तव्य नहीं।

जानकार बताते हैं कि अंतरराज्यीय नदी समझौते तभी टिकते हैं जब दोनों राज्य आंकड़ा साझा करें। छिपाव से भरोसा टूटता है। बाढ़ वाले साल में अतिरिक्त पानी का नियम भी चाहिए, केवल सूखे का हिसाब काफी नहीं।

एक छोटा ट्विस्ट यह है कि सोन कभी फसल बचाती है, कभी गांव डुबाती है। बंटवारा सिर्फ कमी का विषय नहीं। अधिक पानी के प्रबंधन पर भी दो शब्द लिखे जाने चाहिए। नहीं तो अगली मानसून बैठक फिर बुलाई जाएगी।

बिहार-झारखंड के बीच सोन नदी जल विवाद पर दिल्ली बैठक में सहमति की घोषणा हो गई है। सम्राट चौधरी ने 26 साल के इंतजार का अंत बताया। रिपोर्टों में 5.75 बनाम 2.0 मिलियन एकड़ फीट वाले बंटवारे का जिक्र है। किसानों तक फायदा नहर, जलाशय और समय पर पानी से तय होगा। समझौतानामा आने के बाद अमल की निगरानी जरूरी है। खेत में पानी दिखे तभी फैसला पूरा कहलाएगा। अगली खबर दस्तावेज और समय-सारिणी की प्रतीक्षा करेगी।

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लेखक

Sanjna Gupta

संजना गुप्ता डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी कंटेंट राइटर हैं और मुख्य रूप से लाइफस्टाइल, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इससे पहले वे बीबी डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड में सोशल मीडिया कंटेंट राइटर रह चुकी हैं और दैनिक भास्कर में इंटर्नशिप कर चुकी हैं।

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