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Shravani Upakarma: श्रावणी उपाकर्म क्या है? जानिए धार्मिक महत्व, हेमाद्रि संकल्प, ऋषि तर्पण और जनेऊ बदलने की संपूर्ण वैदिक विधि

Shravani Upakarma: श्रावणी उपाकर्म क्या है? जानिए धार्मिक महत्व, हेमाद्रि संकल्प, ऋषि तर्पण और जनेऊ बदलने की संपूर्ण वैदिक विधि
Shravani Upakarma: सनातन धर्म में आत्मशुद्धि, ज्ञानार्जन और अनुशासन बनाए रखने के लिए 16 संस्कारों और विशेष वैदिक परंपराओं का विधान है। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन पर्व है श्रावणी उपाकर्म, जिसे सामान्य बोलचाल में ‘जनेऊ पूर्णिमा’ या दक्षिण भारत में ‘अवनि अवित्तम’ कहा जाता है।
यह अनुष्ठान प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर संपन्न किया जाता है। ‘उपाकर्म’ का शाब्दिक अर्थ होता है किसी शुभ कार्य का आरंभ करना या नया उपक्रम। प्राचीन गुरुकुल परंपरा में ऋषि-मुनि और आचार्य इसी पावन दिवस पर विद्यार्थियों के वेदाध्ययन का नया सत्र प्रारंभ करते थे। इस दिन द्विज वर्ग यानी यज्ञोपवीत धारण करने वाले साधक दशविध स्नान, हेमाद्रि संकल्प और ऋषि तर्पण के माध्यम से वर्षभर में हुए जाने-अनजाने दोषों का प्रायश्चित करते हैं तथा विधिपूर्वक पुराना यज्ञोपवीत त्यागकर नया जनेऊ धारण करते हैं।

Shravani Upakarma: श्रावणी उपाकर्म का आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व

वैदिक परंपरा में श्रावणी उपाकर्म केवल एक धागा बदलने की रस्म नहीं है, बल्कि यह आत्म-मंथन, नैतिक शुद्धि और गुरु-ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है। गृह्यसूत्रों, श्रौतसूत्रों और स्मृति ग्रंथों के अनुसार इस दिन के मुख्य आयाम वर्षभर के दोषों की क्षमा याचना, वेदों की रक्षा करने वाले सप्तऋषियों तथा पितरों का तर्पण और ज्ञान व सदाचार के मार्ग पर चलने का नया संकल्प हैं। इस दिन गायत्री महामंत्र का यथाशक्ति 108 या 1008 बार जप किया जाता है, जिससे साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा और एकाग्रता का संचार होता है।

जनेऊ (यज्ञोपवीत) के तीन सूत्र और उनका महत्व

यज्ञोपवीत में बने तीन पवित्र सूत्र व्यक्ति के त्रिआयामी दायित्वों का प्रतीक हैं। पहला देव ऋण जो ईश्वर और प्रकृति के प्रति आभार दर्शाता है, दूसरा पितृ ऋण जो माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कर्तव्य की याद दिलाता है, और तीसरा ऋषि ऋण जो गुरुओं व ज्ञान परंपरा के प्रति निष्ठा का प्रतीक है। इसके साथ ही ये तीन सूत्र सत्व, रज और तम तीनों गुणों के संतुलन तथा मन, वचन और कर्म की पवित्रता का प्रतिनिधित्व करते हैं। नया जनेऊ धारण करने का अर्थ है जीवन में नए सिरे से पवित्रता और कर्तव्यनिष्ठा को स्थापित करना।

श्रावणी उपाकर्म की प्रामाणिक एवं चरणबद्ध विधि

उपाकर्म का अनुष्ठान किसी पवित्र नदी, तीर्थ या देवालय में सामूहिक रूप से योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसे घर पर भी शुद्ध वातावरण में संपन्न किया जा सकता है।
साधक प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हों और पवित्र नदी या गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। शास्त्र सम्मत विधि में भस्म, गोबर, गोमूत्र, मिट्टी, दुर्वा, कुशा आदि से दशविध स्नान कर शरीर व इंद्रियों की शुद्धि की जाती है। स्नान के उपरांत आचमन और प्राणायाम करके हाथ में जल, अक्षत और कुशा लेकर वर्षभर में हुए दोषों के निवारण हेतु हेमाद्रि संकल्प लिया जाता है, जिसमें त्रुटियों का पश्चाताप कर धर्म मार्ग पर अडिग रहने की प्रतिज्ञा ली जाती है।
इसके बाद तांबे या पीतल के पात्र में शुद्ध जल, अक्षत, चंदन और काले तिल डालकर पूर्वाभिमुख बैठकर देवताओं तथा उत्तराभिमुख होकर कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ जैसे सप्तऋषियों का तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात दक्षिणाभिमुख होकर पितरों को जलांजलि दी जाती है।
तर्पण के बाद नव यज्ञोपवीत को पंचगव्य अथवा गंगाजल से शुद्ध कर उस पर ओंकार और गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है। इसके बाद हाथ जोड़कर “यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥” मंत्र का उच्चारण करते हुए नया जनेऊ दाहिने हाथ से सिर के ऊपर से डालकर बाएं कंधे पर धारण किया जाता है।
नया जनेऊ धारण करने के बाद पुराना जनेऊ सिर के ऊपर से उतारकर दोनों हाथों में पकड़ें और “एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात्ते परित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम्॥” मंत्र का पाठ करते हुए उसे किसी पवित्र नदी या शुद्ध जल में विसर्जित करें।

शुभ तिथि और मुहूर्त से जुड़े नियम

श्रावणी उपाकर्म का मुख्य समय श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि का प्रातःकाल होता है। यजुर्वेदी, ऋग्वेदी और सामवेदी परंपराओं में शाखा भेद के अनुसार तिथियों में थोड़ा अंतर हो सकता है। यदि पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण या भद्रा का गंभीर दोष हो, तो पंचांग विधान के अनुसार उपाकर्म को श्रावण शुक्ल पंचमी या हस्त नक्षत्र युक्त तिथि पर करने की परंपरा है। साधकों को अपने स्थानीय पंचांग, शाखा परंपरा और कुलगुरु के परामर्श अनुसार ही समय का चयन करना चाहिए।

Shravani Upakarma: आधुनिक जीवन में श्रावणी उपाकर्म की प्रासंगिकता

भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली में श्रावणी उपाकर्म एक ऐसा अवसर है जो हमें अपनी जड़ों, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ता है। यह दिन हमें सिखाता है कि गलतियों को स्वीकार कर सुधरना ही सच्ची प्रगति है। चाहे सामूहिक रूप से मंदिर में करें या व्यक्तिगत रूप से, यह अनुष्ठान मन को शांति, अनुशासन और जीवन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।

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लेखक

Netsha Singh

नेत्शा सिंह डेमोक्रेटिक भारत लाइव में हिंदी न्यूज़ कंटेंट राइटर हैं। वे सरकारी योजनाओं, आपका पैसा, देश की खबरों और धर्म-आस्था से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल न्यूज़ लेखन में उन्हें लगभग एक साल का अनुभव है; इससे पहले वे खबर नगरी और ऑनलाइन ताज़ा खबर के साथ काम कर चुकी हैं और यूट्यूब पर समसामयिक विषयों पर कंटेंट भी बनाती हैं।

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