Bihar Neet Student Case: पटना। जहानाबाद की उस छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला, जो राजधानी में NEET की तैयारी कर रही थी, अब अदालत के फैसले पर टिक गया है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने जांच में किसी व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात कहते हुए 6 अक्टूबर 2026 को विशेष पॉक्सो अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को है। अदालत ने सूचक यानी छात्रा के पिता को नोटिस भेजने का निर्देश दिया है।
रिपोर्ट विशेष पॉक्सो न्यायाधीश राजीव रंजन रमण की अदालत में पेश हुई। अपर लोक अभियोजक सुरेश प्रसाद के अनुसार, एजेंसी ने लिखा है कि ऐसे ठोस सबूत नहीं मिले, जिनके आधार पर किसी को आरोपी बनाया जा सके। क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने से केस अपने आप समाप्त नहीं होता। अंतिम राय अदालत की होगी।
मामला चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र के मुन्ना चक स्थित शंभू गर्ल्स हॉस्टल से जुड़ा है। 6 जनवरी 2026 को छात्रा हॉस्टल के एक बंद कमरे में अचेत मिली। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पिता ने शरीर पर चोट के निशान बताए और दुष्कर्म के प्रयास की आशंका जताई थी। 9 जनवरी को चित्रगुप्त नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी।
Bihar Neet Student Case: CBI ने रिपोर्ट में क्या कहा है?
एजेंसी का निष्कर्ष यह है कि प्राथमिकी में लगाए आरोपों के संबंध में किसी खास व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक सामग्री नहीं बनी। जांच फरवरी 2026 में शुरू हुई थी। पूछताछ पटना के हॉस्टल से लेकर जहानाबाद तक उन लोगों से की गई, जिनका मामले से संबंध बताया गया। कई महीने की जांच के बाद 6 अक्टूबर को फाइनल रिपोर्ट अदालत में पहुंच गई।
पहले स्थानीय पुलिस और बाद में विशेष जांच टीम पर भी सवाल उठे थे। जनवरी में इंस्पेक्टर जनरल जितेंद्र राणा के नेतृत्व में SIT बनी थी। पोस्टमार्टम और मेडिकल जांच के निष्कर्षों के बाद दायरा बढ़ा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अंडरगारमेंट पर स्पर्म मिलने की बात सामने आई थी। परिजनों और करीबियों के डीएनए सैंपल लिए गए, लेकिन किसी सैंपल का मिलान उस सामग्री से नहीं हुआ। इसके बावजूद जांच जारी रही और अंत में CBI किसी नामजद आरोपी तक नहीं पहुंची।
हॉस्टल से मौत तक क्या हुआ था?
छात्रा जहानाबाद की रहने वाली थीं और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए पटना के हॉस्टल में ठहरी हुई थीं। 6 जनवरी को उन्हें कमरे में बेहोश पाया गया। पांच दिन बाद अस्पताल में उनकी मौत हो गई। पिता की शिकायत में चोट और यौन हमले की आशंका दर्ज थी, इसलिए मामला पॉक्सो की विशेष अदालत में चला।
शुरुआती जांच पर लापरवाही के आरोप भी लगे। तत्कालीन चित्रगुप्त नगर थानाध्यक्ष रौशनी कुमारी और कदमकुआं थाने के अपर थानाध्यक्ष हेमंत झा को निलंबित किया गया था। हॉस्टल संचालक मनीष कुमार रंजन की गिरफ्तारी भी हुई। विवाद बढ़ने के बाद बिहार सरकार ने जांच CBI को सौंपने की सिफारिश की। फरवरी से केंद्रीय एजेंसी मामले में थी।
Bihar Neet Student Case: क्लोजर रिपोर्ट का मतलब क्या होता है?
क्लोजर रिपोर्ट को फाइनल रिपोर्ट या FR भी कहते हैं। जांच एजेंसी तब यह रिपोर्ट देती है, जब उसे लगता है कि दर्ज अपराध के लिए किसी व्यक्ति को आरोपी बनाने लायक पक्के सबूत नहीं हैं। रिपोर्ट दाखिल होना बरी होना या केस खत्म होना नहीं है। यह केवल एजेंसी की राय है।
अदालत के पास तीन रास्ते रहते हैं। वह रिपोर्ट स्वीकार कर मामला बंद कर सकती है। जरूरत समझे तो आगे या दोबारा जांच का आदेश दे सकती है। एजेंसी की राय से असहमत होकर उपलब्ध सामग्री पर कानूनी कार्रवाई का निर्देश भी दे सकती है। स्वीकार करने से पहले शिकायतकर्ता को नोटिस दिया जाता है, ताकि वह अपनी बात रख सके।
13 अक्टूबर की सुनवाई में क्या हो सकता है?
उस दिन अदालत रिपोर्ट पर आगे की प्रक्रिया तय कर सकती है। छात्रा के पिता को नोटिस मिलने के बाद वे क्लोजर का विरोध करते हुए प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल कर सकते हैं। याचिका में वे उन बिंदुओं को उठा सकते हैं, जिन पर उनके अनुसार जांच अधूरी रही। अदालत दलीलें और रिकॉर्ड देखकर ही अगला आदेश लिखेगी।
फिलहाल गेंद कोर्ट के पाले में है। न तो किसी को आरोपित किया गया है, न ही मौत का कोई ठोस कारण एजेंसी की रिपोर्ट में दोषी से जोड़ा गया है। परिवार अगर आपत्ति दर्ज कराता है, तो सुनवाई लंबी भी हो सकती है।
Bihar Neet Student Case: मामले की टाइमलाइन क्या है?
6 जनवरी 2026 को छात्रा हॉस्टल के बंद कमरे में अचेत मिलीं। 9 जनवरी को पिता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई। 11 जनवरी को इलाज के दौरान मौत हुई और आक्रोश बढ़ा। जनवरी में ही SIT बनी और मेडिकल निष्कर्षों के बाद जांच चौड़ी हुई। फरवरी में सरकार की सिफारिश के बाद CBI ने जांच संभाली। 6 अक्टूबर 2026 को विशेष पॉक्सो अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हुई। अगली तारीख 13 अक्टूबर है।
यह पूरा क्रम दिखाता है कि स्थानीय पुलिस, निलंबन, गिरफ्तारी और केंद्रीय जांच के बाद भी एजेंसी किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने की स्थिति में नहीं पहुंची। अब फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत रिपोर्ट मानती है या परिजनों की आपत्ति पर दोबारा जांच का रास्ता खोलती है।






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