UCC In Bihar: गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इस बयान के बाद बिहार में चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह है कि अगर राज्य में यूसीसी आता है तो शादी, तलाक और संपत्ति के मौजूदा नियम कितने बदलेंगे।

बिहार में मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत से अधिक है। जेडीयू लंबे समय से अल्पसंख्यक वोट पर निर्भर रही है। इसी वजह से पार्टी का रुख सावधानी भरा दिख रहा है। सत्ताधारी गठबंधन के अंदर भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के अनुसार देश में सिविल और आपराधिक कानून अलग-अलग हैं। आपराधिक कानून सभी धर्मों पर एक समान लागू होता है। सिविल कानून शादी, तलाक, संपत्ति और मानहानि जैसे मामलों से जुड़ा है और अभी धर्म के हिसाब से अलग-अलग चलता है। इन्हीं को पर्सनल लॉ कहा जाता है।

UCC In Bihar: अमित शाह के बयान के बाद बिहार में नेताओं ने क्या कहा?

अमित शाह के बयान के बाद केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि यह कानून आजादी के बाद ही लागू हो जाना चाहिए था। उनके मुताबिक कांग्रेस ने तुष्टीकरण की राजनीति के कारण इसे नहीं लागू होने दिया।

जेडीयू नेता श्याम रजक का रुख अलग है। उन्होंने कहा, “इस मुद्दे पर हमारा रुख हमारे नेता ने बहुत पहले ही स्पष्ट कर दिया था। भले ही हमारी पार्टी संसद में यूसीसी विधेयक का समर्थन कर रही है, लेकिन वह बिहार में इसे लागू करने के पक्ष में नहीं है।”

पत्रकारों ने पूछा कि नीतीश कुमार के राजनीति से संन्यास और भाजपा नेता सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद क्या जेडीयू का रुख मायने रखता है। रजक ने जवाब दिया, “मुख्यमंत्री भले ही भाजपा के हों, लेकिन सरकार सहयोगियों की मदद से चलाई जा रही है। हमारा रुख स्पष्ट है, बिहार में यूसीसी लागू करने का सवाल ही नहीं उठता।”

यूसीसी क्या है और पर्सनल लॉ से कैसे अलग है?

विराग गुप्ता बताते हैं कि यूसीसी एक सिविल कानून है। सिविल मामलों में परंपरा, रीति-रिवाज और संस्कृति की भूमिका होती है। जोर सजा से ज्यादा समझौते पर रहता है। हत्या, मारपीट या अपहरण जैसे मामले आपराधिक कानून के दायरे में आते हैं और वे सभी समुदायों के लिए एक जैसे हैं।

अगर बिहार में यूसीसी लागू होता है तो मुस्लिम, हिंदू और ईसाई सभी के लिए शादी और संपत्ति से जुड़े मामलों में एक समान कानून होगा। अल्पसंख्यकों की चिंता यही है कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक नियम खत्म हो सकते हैं।

संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यह नीति निर्देशक तत्व है, मौलिक अधिकार नहीं। विराग गुप्ता पूछते हैं कि संविधान में प्रावधान होने के बावजूद केंद्र स्तर पर कानून इतने दशकों बाद भी क्यों नहीं बना।

UCC In Bihar: शाहबानो मामले और अनुच्छेद 44 का क्या संबंध है?

1985 के मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 44 का जिक्र किया था और कहा था कि यह लंबे समय से प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाया है। बाद के एक फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले के फैसलों में सरकार को यूसीसी लागू करने का बाध्यकारी आदेश नहीं दिया गया था। वे टिप्पणियां और सुझाव थे।

ब्रिटिश काल में भी अलग-अलग समुदायों के कानूनों को एकरूप करने की चर्चा हुई थी। 1840 के आसपास संहिताकरण की पहल हुई, लेकिन तब समान सिविल कोड लागू नहीं हुआ। विराग गुप्ता कहते हैं कि राज्य अपने स्तर पर कदम उठा रहे हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर एक समान ढांचा क्यों नहीं बन रहा।

भारत जैसे विविधता वाले देश में कानून बनाते समय समुदायों, क्षेत्रों और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े अपवादों का सवाल उठेगा। अगर अपवाद बहुत ज्यादा रखे गए तो समान संहिता का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसलिए यह सिर्फ कानून बनाने का विषय नहीं, व्यापक संवैधानिक और सामाजिक विमर्श का विषय भी है।

मुस्लिम समुदाय की मुख्य चिंताएं क्या हैं?

मुस्लिम पक्ष अनुच्छेद 25 का हवाला देता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उनका कहना है कि शादी-ब्याह और परंपराओं पर समान कानून थोपना संविधान के खिलाफ है। जानकारों के मुताबिक शरिया करीब 1400 साल पुराना है और कुरान तथा पैगंबर की शिक्षाओं पर आधारित है। इसलिए इसे आस्था से जोड़ा जाता है। चिंता यह है कि 1947 के बाद मिली धार्मिक आजादी प्रभावित हो सकती है।

सवाल यह भी उठ रहे हैं कि एक से ज्यादा शादी का प्रावधान खत्म होगा या नहीं, निकाह के मौजूदा तरीके बदलेंगे या नहीं और विरासत के नियम कैसे एक जैसे होंगे। स्रोत में इन सवालों को चर्चा का हिस्सा बताया गया है, लेकिन लागू होने वाले अंतिम प्रारूप की विस्तृत रूपरेखा नहीं दी गई है।

बिहार में बौद्ध आबादी 0.08 प्रतिशत, ईसाई 0.05 प्रतिशत और सिख 0.01 प्रतिशत है। मुस्लिम आबादी का हिस्सा अपेक्षाकृत बड़ा है। जेडीयू को अल्पसंख्यक तबके का वोट मिलता रहा है, इसलिए पार्टी इस मुद्दे पर सतर्क रुख अपनाए हुए है।

UCC In Bihar: बिहार में आगे क्या स्थिति बन सकती है?

अभी राज्य में यूसीसी लागू नहीं हुआ है। अमित शाह का बयान एनडीए शासित राज्यों के लिए समयसीमा बताता है। जेडीयू साफ कह रही है कि बिहार में इसे लागू करने का सवाल नहीं उठता, भले ही संसद में विधेयक का समर्थन हो। सरकार सहयोगियों के साथ चल रही है, इसलिए गठबंधन के अंदर सहमति जरूरी होगी।

पाठकों के लिए व्यावहारिक मतलब यह है कि निकाहनामा, तलाक की प्रक्रिया और संपत्ति बंटवारे के मौजूदा पर्सनल नियम तभी बदलेंगे जब राज्य स्तर पर कानून बने और लागू हो। तब तक वर्तमान व्यवस्था जारी रहेगी। राष्ट्रीय ढांचे और राज्य स्तर के अपवादों पर अभी विमर्श जारी है।

चाय की दुकानों से सियासी गलियारों तक यही चर्चा है कि समान कानून आने पर रीति-रिवाज कितना बचेगा और कानूनी एकरूपता कितनी होगी। विराग गुप्ता के अनुसार बिना व्यापक चर्चा के बनाए गए कानून में अपवाद ज्यादा होने पर मूल मकसद कमजोर हो सकता है। बिहार की जनसंख्या बनावट और गठबंधन की राजनीति दोनों इस फैसले को प्रभावित करेंगे।

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